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जातिवाद/क्या श्मशान के भी टुकड़े होते हैं ?

क्या राष्ट्र निर्माण में बाधा है जातिवाद?

समानता का अधिकार भारतीय संविधान द्वारा भारत की जनता को दिए गए छह मौलिक अधिकार में से एक है। समानता के अधिकार के अन्तर्गत कानून, धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव, रोजगार में भेदभाव को रोकना और अस्पृश्यता (छूआछूत) का उन्मूलन शामिल है। अनुच्छेद 14 कहता है “सभी कानून की आंखों के बराबर हैं”

संविधान के अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता का व्यवहार एक अपराध है और ऐसा करने वाला कोई भी कानून द्वारा दंडनीय है। अस्पृश्यता अधिनियम (नागरिक अधिकार अधिनियम के संरक्षण) के अन्तर्गत किसी व्यक्ति को पूजा स्थल में प्रवेश करने, जल स्रोत जैसे नल, कुएं या तालाब से पानी लेने से रोकना अपराध है, इसके दंड स्वरूप जुर्माना का प्रावधान है।

क्या है जाति ?

जाति  प्रथा एक मानसिक  धारणा है, जिसे वर्ण व्यवस्था भी कहा जाता है। तार्किक तौर पर इसका कोई आधार नहीं है, फिर भी इस कुप्रथा की सामाजिक जड़े बहुत ही मजबूत है। 21 वीं सदी के भारत में भी जातिवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं यह बात किसी से छुपी नहीं है। ना ही जातिवाद के जहर से कोई भी वर्ग अछूता है। फलां जाति श्रेष्ठ है, फलां निकृष्ट ऐसी कुंठित मानसिकता ना सिर्फ मनुष्य को मनुष्य से पृथक करती है, वरन् समाज को दीमक की तरह चाटने का काम करती है।

इतिहास गवाह है कि सोने की चिड़िया भारत को लूटने और गुलाम बनाने के लिए विदेशी आक्रांताओं ने सदैव ही इसी जाति व्यवस्था का फायदा उठाया। इतिहास से जुड़ी एक कहानी इस कुप्रथा की सच्चाई बयां करती है, कि कैसे जाति व्यवस्था के कैंसर ने भारत को गुलामी की ओर ढ़केला।

कैसे जाति प्रथा ने गुलामी की नींव रखी?

“मोहम्मद गोरी ने 16 बार भारत पर आक्रमण किया, हर बार पृथ्वीराज चौहान की वीर सेना से उसे पराजय का सामना करना पड़ा। कहते हैं 17वीं बार आक्रमण की तैयारी में गोरी किसी ऊंची स्थान पर खड़ा दुश्मन खेमें की ओर देख रहा था। उसकी नजर पृथ्वीराज के खेमे से दो तरफ उठती आग के धुएं पर गयीं, उसने उत्कंठावश उस धुएं के बारे में पूछा, गोरी के भेदिये ने बताया वहाँ सैनिकों का खाना बन रहा है। एक ओर ऊंची जाति का और दूसरी ओर नीची जाति का भोजन बन रहा है। इस एक भेद ने भारत का इतिहास बदल दिया। गोरी खुशी से झूम उठा क्योंकि हिन्दुस्तान फतह का सूत्र उसे मिल गया। गोरी ने कहा ये तो स्वयं ही बंटे (जातियों में) हुए है, और इन्हें हराना आसान है। अंततः 17वी बार जब तराइन की लड़ाई में गोरी को जीत हासिल हुई। गोरी की जीत ने देश की गुलामी नींव रखी।“

19 फरवरी बनैल गांव, पहासू ब्लॉक, बुलंद शहर, उत्तर प्रदेश की एक खबर सोशल मीडिया में वायरल हो गयी। इस गांव के श्मशान घाट को तार बांध कर दो टुकड़ों में यों बांटा गया, मानो ये दो देश की सीमा हो। तार के एक ओर तथाकथित ऊंची जाति का शवदाह होता है वहीं दूसरी ओर दलित जाति का शवदहन। ये हास्यास्पद है या दर्दनाक, जो हमारे 21वीं सदी के विकासशील भारत में शवों को भी जाति में बांट दिया गया।

संविधान के मौलिक अधिकरों की धज्जियां उड़ाने का यह कोई नया मामला नहीं है। हर मिनट हमारे देश में कितनों के साथ जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्रीयता के आधार पर मौलिक अधिकारों का हनन होता है।

जातिवाद, सामाजिक असमानता दीमक की तरह देश को चाट रहा है। ये कुरीतियां  राष्ट्र की एकता, विकास, अखंडता की राह की सबसे बड़़ी बाधा है। अपना हित साधने के लिए राजनेताओं ने और धर्म के ठेकेदारों ने इस कुरीति को सदैव ही हवा दी।

भगवान बुद्ध, कबीर, गुरुनानक देवजी, ज्योतिबा फूले, सावित्री बाई फूले सदृश कई महामानवों ने समय समय पर समाज में व्याप्त कुरीतियों पर कुठाराघात किया और कुरीतियों के उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त किया। शिक्षा, अन्तर्जातीय विवाह और सामाजिक जागृति कार्यक्रम का आयोजन से इस कुप्रथा को खत्म किया जा सकता है।

हमारे ऋषियों ने कहा है, “वसुधैव कुटुंबकम्” अर्थात समस्त पृथ्वी एक परिवार है। जिस संस्कृति ने सारी पृथ्वी को परिवार मानने की विचारधारा विश्व को दी, वह संस्कृति अपने परिवार में अस्पृश्यता की कुभाव कैसे दे सकती है। यह देश हमारा है इसे स्वस्थ, समृद्ध, विकसित बनाने में ही हर नागरिक और देश का भला है, कुरीतियों से सदैव ही समाज और राष्ट्र की हानि होती है।

जय हिन्द

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