क्या है वैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग की कथा? क्या है, कामना लिंग का देवघर में स्थापित होने का रहस्य जानें हिन्दी में ?

 

क्यों वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को रावणेश्वर धाम कहते हैं? रावण का वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग से क्या संबंध है, जाने?

क्यों सावन माह में वैद्यनाथ धाम में भक्तों का सैलाब उमड़ता है? जाने हिन्दी में

वैद्यनाथ धाम सिद्धपीठ, शक्तिपीठ और द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक है।

झारखंड, देवघर स्थित वैद्यनाथ धाम या वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जहां पर भगवान शिव और शक्ति दोनों विराजमान है। भगवान भोलेनाथ के 12 ज्योतिर्लिंगों में से 9वां ज्योतिर्लिंग है। इस ज्योतिर्लिंग को कामना लिंग भी कहा जाता है, और मान्यता है कि, यहां आने वाले हर भक्त की देवाधिदेव महादेव के दर्शन मात्र से हर कामना पूर्ण होती है।

धार्मिक मान्यता है कि, बैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग होने के साथ  ही एक शक्तिपीठ भी है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक है, यहाँ माता सती का हृदय गिरा था। मंदिर में आने वाले सभी  भक्तों की इच्छा पूर्ण होती है। इस  मंदिर के शिखर पर स्थित पंचशुल का भी अलग महत्व है।

सिद्ध पीठ किसे कहते हैं?

सिद्ध पीठ उस स्थान को कहा जाता है जहाँ तपस्या, योग और तांत्रिक प्रयोग शीघ्र सिद्ध होते हैं। साथ हीं, जहाँ योग और तप से सिद्धि प्राप्त व्यक्ति, ज्ञानी, भक्त, महात्मा और तपस्वी आदि रहते हैं। सिद्ध पीठ देवताओं का निवास स्थान होता है। सिद्ध पीठ को सिद्ध भूमि, सिद्ध क्षेत्र या सिद्ध आश्रम भी कहते हैं।

वैद्यनाथ धाम की महिमा

देवघर अर्थात वैद्यनाथ धाम महाकाल के साथ महाकाली प्रत्यक्ष रूप में रहती है। कल्याणकारी बटुक भैरव, भगवान सूर्य देव, विघ्न विनाशक गणेश यहां निवास करते हैं। यहां का सामान्य जल भी गंगाजल के समान पवित्र होता है। यहां की मिट्टी सोने के समान है। यहां साक्षात कामना लिंग वैद्यनाथ में भगवान शिव विद्यमान है, जो अपने भक्तों की कामना शीघ्र पूरी करते हैं। देवताओं का निवास स्थान होने के कारण यह सर्वोत्कृष्ट सिद्ध पीठ है।

बाबा धाम या वैद्यनाथ धाम में स्थापित सिद्ध शिवलिंग से जुड़ी एक बहुत ही रोचक पौराणिक कथा है,

वैद्यनाथ धाम  या रावणेश्वर वैद्यनाथ धाम की पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण बहुत बड़ा शिव भक्त था। रावण का त्रिलोक पर आधिपत्य था। उसने विचार किया कि, यदि महादेव लंका में निवास करेंगे, तो मेरा राज्य सदैव सम्पन्न रहेगा। रावण भोलेनाथ को लंका में लाने को अधीर हो उठा। रावण ने अतुल बल सामर्थ्य से भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु तपस्या प्रारंभ किया।

रावण गर्मी मे पंचाग्नि सेवन करता, ठंड में पानी में रहता और वर्षा ऋतु में खुले मैदान में रहकर तप करता।

वर्षों तक कठिन तपस्या से भी उसे महादेव दर्शन नहीं दिये। तब उसने शिवलिंग की स्थापना की और वहीं गड्ढा खोदकर अग्नि प्रज्वलित की। वैदिक विधान से वह महादेव शिव जी की पूजा की।

फिर वह एक एक करके अपना सिर  काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने लगा। इस प्रकार नौ सर चढ़ाने के बाद जब रावण अपना दसवां सर काटने को उद्यत हुआ ही था, तब भगवान शिव प्रसन्न होकर रावण को दर्शन दिए। भगवान शिव ने रावण से कहा- मैं तुम्हारे भक्ति से प्रसन्न हूँ, अतः तुम अपना अभीष्ट वर मांगो।

रावण के पास सोने की लंका के और तीनों लोकों पर आधिपत्य था। साथ ही उसने कई देवताओं, यक्षों और ऋषि-मुनियों को लंका में कैद कर रखा था। इसीलिए रावण ने भगवान शिव को भी कैलाश पर् छोड़कर लंका चलने का निवेदन किया।

तब महादेव शिव ने रावण को कामना लिंग दिया, किंतु साथ ही चेतावनी भी- “रावण! यदि तुमने इस कामना लिंग को रास्ते में कहीं भी भूमि पर रख दिया, तो तुम या कोई भी देवता या दानव इसे उठा नहीं सकेगा और यह वहीं अचल होकर स्थापित हो जाएगा। इसलिए इसे सावधानी से ले जाना”।

जैसे ही रावण प्रसन्न होकर कामनालिंग को उठाना चाहा, तो उस समय पार्वती माता ने कहा, “दशानन पहले तुम्हें आचमन करना चाहिए, क्योंकि बिना आचमन शिवलिंग स्पर्श करने से आयु, विद्या और बल का नाश होता है। पार्वती जी की बात मान ली पार्वती जी ने रावण को आचमन के लिए जल दिया, जो अभिमंत्रित था अर्थात उसमें वरूण देवता का वास था।

महादेव और माता को प्रणाम कर दशानन रावण कामना लिंग को अपने लंका नगरी की ओर चल दिया। भगवान शिव के कैलाश छोड़ने की बात सुनते हीं, सभी देवगण चिंतित हो उठे। सभी देवगण इस समस्या के समाधान हेतु भगवान विष्णु के समक्ष गए।

उधर रास्ते में हरितकी वन (जहाँ वर्तमान वैद्यनाथ धाम है)  में पहुंच कर रावण लघुशंका से पीड़ित हो गया। शिवलिंग को हाथ में लेकर लघुशंका करना रावण को उचित नहीं लगा, इसलिए उसने अपने आसपास देखा कि कहीं कोई मिल जाए, जिसे वह शिवलिंग पकड़ा सके। उसने पास खड़े एक गोपकुमार (ग्वाला) बैजू को देखा और निवेदन करके वह शिवलिंग गोपकुमार, जिसका नाम बैजू था, को शिवलिंग पकड़े रहने को कहकर लघुकथा के लिए चला गया।

पार्वती माता ने जो मंत्रित जल दिया था उससे रावण का पेट जल से भर गया और वह बहुत देर तक लघुशंका करता रहा। रावण जब लघुशंका करने लगा, तब उसी लघुशंका से एक तालाब बन गया।

गोपकुमार बैजू ज्यादा देर तक शिवलिंग का भार सहन नहीं कर सका और शिवलिंग को भूमि पर रख दिया। धरती पर रखते ही शिवलिंग अचल होकर वहीं स्थापित हो गया। कहते हैं कि, उस बैजू नाम के ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु वहां आए थे।

जब रावण लघुशंका से निवृत्त होकर लौट कर आया, तो शिव लिंग को भूमि पर स्थापित पाया। वह अपने पूर्ण बाहुबल से शिवलिंग को उठाने की कोशिश करने लगा। अपने लाख कोशिशों के बाद भी वह नाकाम रहा। हताश और  क्रोधित होकर रावण शिवलिंग पर अपना अंगूठा दबाकर वहां से चला गया।

यही मनोकामना शिवलिंग ‘वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंग’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तत्पश्चात् ब्रह्मा, इंद्रादि समस्त देवगण वहां आकर स्वयं महादेव का दर्शन पूजन और प्रतिष्ठा किया। और ‘वैद्यनाथ महादेव’ की स्तुति कर लौट गए।

मान्यता हैं, वैद्यनाथ महादेव के दर्शन पूजन और स्तुति से समस्त दुःखों का शमन होता है और सुखों की प्राप्ति होती है। यह दिव्य मनोकामना शिवलिंग मोक्षदायिनी और मुक्ति प्रदायक है।

चूंकि रावण कठिन तपस्या के बाद शिवलिंग को कैलाश से देवघर तक लाया था, इसलिए इसे रावणेश्वर धाम और शिवलिंग को रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है।  ज्योतिर्लिंग मंदिर से बैजू मंदिर 700 मीटर दूर स्थापित है।

सावन माह और शिव भक्तों का संबंध

हिंदू धर्मावलंबी सावन महीने को भगवान शिव के उपासना का सबसे पावन महीना मानते हैं। हर साल श्रावण के पवित्र महीनें में लाखों श्रद्धालु ‘बोल बम’ के जयकारे लगाते, 105 किलोमीटर दूर सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर कांवड़ लेकर बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करने देवघर आते हैं। कांवड़िये सौ किलोमीटर की अत्यन्त कठिन पैदल यात्रा कर बाबा को जल चढाते हैं।

वैद्यनाथ धाम में अनेक रोगों से छुटकारा पाने हेतु भी बाबा का दर्शन करने श्रद्धालु आते हैं। ऐसी प्रसिद्धि है कि श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की लगातार आरती-दर्शन करने से लोगों को रोगों से मुक्ति मिलती है।

मुख्य मंदिर के चारों तरफ प्रांगण में 22 अन्य देवी-देवताओं के मंदिर है।

  1. पार्वती मंदिर

मंदिर के प्रांगण के बीच मुख्य मंदिर के बिल्कुल सामने पूर्व दिशा में कामदा गौरी सर्वशक्ति स्वरुपणी माता पार्वती का मंदिर है। इसी स्थान पर माता सती का हृदय गिरा था। इसीलिए यह शक्ति पीठ या हृदय पीठ स्थान है।

  •  जगत जननी मन्दिर

पार्वती मन्दिर से दक्षिण की ओर जगत जननी मंदिर है। यहां देवी-देव आराधना मुद्रा में बैठीं है।

  • सिद्धि दाता गणेश मंदिर

यहाँ विध्न विनाशक गणेश भगवान अष्टभुज और नृत्य मुद्रा में हैँ। अष्ट भुजाओं में खड़ग, शंख, चक्र, गदा, लड्डू आदि हैं। बड़ा उदर और जनेऊ धारण किए गणपति की मूर्ति है। नीच रिद्धि-सिद्धि विराजमान हैं।

  • चतुर मुख ब्रह्मा जी
  • संध्या माता
  • महाकाल भैरव बाबा
  • हनुमानजी
  • मनसा देवी मां
  • सरस्वती देवी मां
  • सूर्य नारायण मंदिर
  • बगलामुखी भगवती माता
  • राम , लक्ष्मण जानकी मंदिर
  • गंगा माता
  • आनंद भैरों
  • गौरी शंकर मंदिर
  • माता काली
  • माता तारा
  • नर्मदेश्वर महादेव
  • अन्नपूर्णा देवी
  • लक्ष्मी नारायण मंदिर
  • नीलकण्ठ मंदिर
  • नन्दी बैल बसाहा

ये सभी 22 मंदिर एक ही प्रांगण में ही मुख्य मंदिर के चारों ओर है। ऐसा लगता है मानों सभी देवी-देवता भगवान शिव की परिक्रमा कर रहे है। प्रांगण में दक्षिण की ओर संध्या और कालभैरव मंदिर के बीच पीतल का एक बड़ा घंटा लटका है। इस घंटे को नेपाल के राजा ने दिया था।

चंद्रकूप

यह एक पुराना ऐतिहासिक कुंआ है। रावण ने अनेक तीर्थों के जल इस कूप में डालें थे। मंदिर के तीन दरवाजे हैं। उत्तर दिशा में सिहं द्वार है, यह चंद्र कूप के पास है। कांवड़ इसी प्रवेश द्वार से लेकर आते है। दूसरा पूर्व द्वार है, तीसरा पश्चिमी द्वार है।

तीनों द्वारों के ऊपर कीर्तन भवन है और तीनों द्वारों की अलग-अलग कीर्तन मंडलियां हैं, जो प्रतिदिन संध्या काल में कीर्तन करती है।

वैद्यनाथ मंदिर की वास्तुकला

वैद्यनाथ धाम मंदिर कमल के आकार का बहुत 72 फीट लंबा मंदिर है। इस मंदिर में प्राची और आधुनिक काल का प्राचीन स्थापत्य कला का प्रभाव देखो मिलता है। यहां भगवान वैद्यनाथ का मुंह पूर्व की दिशा की ओर है। मुख्य मंदिर के अलावा मंदिर परिसर में अन्य देवी देवताओं के 22 मंदिर हैं।

यह मंदिर तीन भागों में विभक्त है-  मुख्य मंदिर मुख्य मंदिर का मध्य भाग और मुख्य मंदिर का प्रवेश द्वार गर्भगृह में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की गई है।

पुराणों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र के प्रहार से मां शक्ति के हृदय का भाग यहीं पर कट कर गिरा था। वैद्यनाथ दरबार माता शक्ति के 51 शक्तिपीठों में से एक है। कहते हैं शिव और शक्ति के इस मिलन स्थल पर ज्योतिर्लिंग की स्थापना खुद देवताओं ने की थी। वैद्यनाथ धाम धाम के बारे में कहा जाता है यहां मांगी गई मनोकामना जरूर पूरी होती है। भगवान श्री राम और महावीर हनुमानजी ने श्रावण के महीने में यहां कावड़ यात्रा भी की थी। वैद्यनाथ धाम धाम में स्थित भगवान भोले शंकर का ज्योतिर्लिंग यानी शिवलिंग नीचे की तरफ दबा हुआ है। शिव पुराण और पद्म पुराण के पाताल खंड में इस ज्योतिर्लिंग की महिमा गाई गई है। मंदिर के निकट एक विशाल तालाब स्थित है। बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर सबसे पुराना है, जिसके आसपास और भी अनेकों अन्य मंदिर बने हुए हैं।

भोलेनाथ का मंदिर माता पार्वती जी के मंदिर के साथ जुड़ा हुआ है। यहां हर साल महाशिवरात्रि के दो दिन पहले शिव मंदिर और मां पार्वती और लक्ष्मी नारायण के मंदिर से  पंचसूल उतारे जाते हैं। इस पंचशूल को स्पर्श करने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। महाशिवरात्रि से एक दिन पहले विधि-विधान के साथ इन सभी पंचशूल की पूजा की जाती है और फिर वापस मंदिर शिखर पर स्थापित कर दिया जाता है।

मान्यता है कि देवघर के वैद्यनाथ मंदिर को स्वयं देव शिल्पी विश्वकर्मा भगवान ने बनाया है। इतिहासकारों के अनुसार, मौजूदा संरचना 1496 ई में गिधौर (जमुई, बिहार) के राजा पूरनमल ने वैद्यनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था।

पंचशूल रहस्य

पंचशूल को सुरक्षा कवच है। कहते हैं कि – ये पंचशूल शरीर के पांच विकारों काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह का नाश करने का प्रतीक है। भौतिक शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है, अतः पंचशूल को उसका एक प्रतीक भी मानते हैं। मान्यता यह भी कि पंचशूल सुरक्षा कवच की तरह मंदिर की सुरक्षा करता है, इसलिए आज तक मंदिर में किसी तरह की आपदा नहीं आई। 

देवघर के दर्शनीय स्थान

  1.  शिवगंगा : यह एक प्राचीन सरोवर है। यह मुख्य मंदिर से उत्तर की ओर है। मान्यता है कि, रावण ने लघुशंका के बाद आचमन के लिए पृथ्वी पर मुष्टि प्रहार कर जल प्रवाहित किया था जिससे यह सरोवर बना। यात्री शिव गंगा में स्नान करके वैद्यनाथ मंदिर में जाते हैं।
  •  बैजू मंदिर : यह भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है।यह मुख्य मंदिर से दक्षिण की ओर है।।पहले यहाँ हरितकी वन था और बैजू यहाँ अपनी गाय चराता था।
  •  हरिला जोड़ी : यह शिवगंगा सरोवर से उत्तर की ओर प्रसिद्ध उपतीर्थ हरिला जोड़ी है। यहाँ एक जोड़ा हरितकी वृक्ष का था। इसीलिए इसे हरिला जोड़ी कहा जाता है।
  • युगल मंदिर ( नौलखा) : यह मंदिर रानी चारूलता (कलकत्ता की) ने बनवाया था। बाल गोपाल इनके इष्ट देवता थे।
  •  तपोवन : यह बाबा धाम से लगभग 8 किमी दूर है। यहाँ पर श्री बालानंद ब्रह्मचारी की ध्यान कुटी है। यहाँ बालेश्वर शिव और दुर्गा माता का मंदिर है।
  • त्रिकुटाचल पहाड़ : यह मयूराक्षी नदी का उद्गम है। तपोवन से 10 किमी दूर त्रिकूट नामक पहाड़ी है। यहाँ त्रिकुटेश्वर (शिव) मंदिर है।
  •  नंदन पहाड़ : वैद्यनाथ धाम मंदिर से लगभग डेढ़ मील दूर एक छोटीसी पहाड़ी है, जिसे नंदन वन कहते हैं
  •  रामाकृष्णा विद्या पीठ
  •  अजगेबीनाथ मंदिर
  • वासुकी नाथ मंदिर
  • ध्यान कुटी
  • स्फटिक स्वंयभू लिंग
  • चंडी पहाड़ी
  • कुंडेश्वरी देवी
  • रामनिवास ब्रह्मचर्य आश्रम
  • मानसरोवर देवसंघ (नवदुर्गा) सत्संग नगर
  • शीतला मंदिर
  • पागल बाबा मंदिर
  • पहाड़ कोठी (जसीडीह)
  • आरोग्य भवन (जसीडीह)

आदि कई देखने योग्य स्थान है। महाशिवरात्रि और श्रावणी मेला में बाबा बैद्यनाथ नाथ के धाम में जनसैलाब उमड़ता है लाखों भक्त जलाभिषेक करने हेतु मीलों यात्रा करके आते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल ही में बैद्यनाथ धाम मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए हवाई संपर्क को बढ़ावा देने के लिए देवघर हवाई अड्डे का उद्घाटन किया।

नोट : दो अन्य वैद्यनाथ मंदिर भी हैं, एक परली वैद्यनाथ (मध्यप्रदेश) और दूसरा बैजनाथ पपरोला (कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश)

दोस्तों वैद्यनाथ धाम से जुड़ी उपरोक्त जानकारी आपको कैसी लगी कृपया कमेंट करें और ऐसी जानकारी के लिए हमारे वेबसाइट से जुड़े रहे।

धन्यवाद, जय हिंद

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