्यों की जाती है गोवर्धन की परिक्रमा और पूजा? गोवर्धन की ब्रज में उत्पत्ति की क्या कहानी? क्या है तिलतिल कम होते गोवर्धन पर्वत का रहस्य?

गिरिराज गोवर्धन पर्वत हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ स्थल है, गोवर्धन पर्वत की पूजा और परिक्रमा से समस्त दुःखों और शत्रुओं का नाश होता है। गोवर्धन पर्वत मथुरा से 26 किमी पश्चिम में डीग हाईवे पर स्थित है।

मान्यता है कि गोवर्धन पर्वत के कण-कण में भगवान श्रीकृष्ण व्याप्त हैं और गोवर्धन की परिक्रमा करने से सभी मन्नतें पूरी हो जाती हैं। आस्था और श्रद्धा का यह तीर्थ गिरिराज गोवर्धन 8 किमी लंबा है और छोटे-छोटे बलुई पत्थरों से बना है।

ति‍ल-ति‍ल कर घटते इस पावन पर्वत की लोग लोट-लोट कर परि‍क्रमा पूरी करते हैं। सालों भर हजारों श्रद्धालु अपनी-अपनी मनोकामनाओं को लेकर गोवर्धन आते हैं अपनी श्रद्धा-सुमन अर्पि‍त और 21 कि‍लोमीटर के फेरे लगाते हैं।

कहते हैं, 5000 साल पहले यह पर्वत 30 हजार मीटर ऊंचा हुआ करता था। पर अब इसकी ऊंचाई घटकर बहुत कम हो गई है। इसके तिल-तिल कर घटने के पीछे एक बड़ी ही रोचक कहानी है।

गोवर्धन पर्वत का रहस्य पौराणिक कथा 1

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्‍ण लीला से ही पुलस्त्य ऋषि मथुरा में गोवर्धन पर्वत को लाए थे।  कथाओं के अनुसार, पुलस्त्य ऋषि तीर्थ यात्रा करते हुए गोवर्धन पर्वत के पास पहुंचे तो उसके सौंदर्य  और वैभव देखकर मोहित हो गए और उसे साथ ले जाने के लिए गोवर्धन के पिता द्रोणांचल पर्वत से निवेदन किया। ऋषि पुलत्स्य ने द्रोणांचल पर्वत से कहा कि, मैं काशी में रहता हूँ और गोवर्धन को काशी जाकर वहां पूजा करूंगा।

द्रोणांचल दुःखी हृदय से गोवर्धन को पुलस्त्य ऋषि के साथ जाने की अनुमति दे दी। काशी जाने से पहले गोवर्धन ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा कि मैं इतना विशाल हूँ, ऐसे में आप मुझे काशी कैसे ले जाएंगे? तो पुलस्त्य ऋषि ने अपने तपोबल से गोवर्धन को आकार कम कर हथेली पर रखकर ले जाने की बात कही।

गोवर्धन ने शर्त रखी कि, वह एक बार हथेली में आने के बाद उसे जहाँ भी रखा जाएगा, वह वहीं स्‍थापित हो जाएगा। गोवर्धन की शर्त मानकर पुलस्त्य ऋषि गोवर्धन को हथेली पर रखकर काशी चल दिए।

पुलस्त्य ऋषि और गोवर्धन जब मथुरा पहुंचे, तब गोवर्धन ने सोचा कि श्रीकृष्‍ण इसी पावन भूमि पर लीला करनेवाले हैं। अतः यहाँ उसे श्री कृष्ण का सानिध्य और मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। यह विचार आते ही गोवर्धन अपना वजन  बढाने लगा,  फलतः पुलस्त्य ऋषि को को थकान हो गई और ऋषि पुलत्स्य, गोवर्धन पर्वत को जमीन पर रखकर सो गए।

पुलस्त्य ऋषि जब नींद से जागे, तो उन्‍होंने गोवर्धन पर्वत को चलने को कहा। तब गोवर्धन ने उन्हें अपनी शर्त याद दिलाई। गोवर्धन के इस छल से ऋषि पुलत्‍स्‍य कुपित हो गए और उन्‍होंने क्रोध में गोवर्धन पर्वत को हर दिन मुट्ठी भर घटने का श्राप दे दिया। पुलस्त्य ने शाप दिया कि तुम्‍हारी ऊंचाई कम होती जाएगी और कलयुग में तुम पृथ्‍वी में मिल जाओगे। मान्यता है, कि पुलत्‍स्‍य ऋषि के श्राप के फलस्वरूप गोवर्धन पर्वत की ऊंचाई जो कभी 3000 मीटर थी ,वो अब करीब 30 मीटर ही है।

सभी तीर्थों में सबसे महान तीर्थ स्थल है, ब्रज धाम है।  मान्यता है की, चारो धाम की यात्रा और गिरिरा गोवर्धन पर्वत की 21 किलोमीटर की परिक्रमा दोनों बराबर है ।

 

गोवर्धन पर्वत का रहस्य पौराणिक कथा 2

भगवान कृष्ण के पिता नंद बाबा ने एक बार अपने भाई उपनंद से पूछा कि- “गोवर्धन पर्वत वृंदावन की पावन भूमि पर कैसे आया?”

नंद बाबा के भाई उपनंद ने कहा कि- “पांडवों के पिता पांडु ने भी यही प्रश्न अपने दादा भीष्म पितामह से पूछा था। भीष्म पितामह ने जो कहानी पांडु को सुनाई वह इस प्रकार है-

एक दिन गोलोक वृंदावन में भगवान श्री कृष्ण ने राधा जी से कहा कि- “जब हम ब्रजभूमि पर जन्म लेंगे, तब हम वहां पर अनेक लीलायें करेंगे। हमारी लीला धरतीवासियों की स्मृतियों में हमेशा रहेगी। पर समय के साथ यह सब कुछ नष्ट हो जायेंगी। परन्तु गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी धरती के अन्त तक रहेंगी। यह सुनकर राधारानी प्रसन्न हो गईं।

गोवर्धन पर्वत का रहस्य पौराणिक कथा 3

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार गोवर्धन को त्रेता युग का माना जाता है। आतातायी रावण से सीता माता की मुक्ति कराने हेतु भगवान राम ने समुद्र पार कर लंका पर आक्रमण की योजना बनाई। विशाल समुद्र को पार करने के लिए सेतु बनाने के लिये उन्होंनें अपनी वानर सेना को पत्थरों की खोज में भेजा। राम भक्त हनुमान जी पत्थर की खोज में हिमालय चले गए और वहां से गोवर्धन पर्वत को अपने साथ लाने लगे। तभी उन्हें सूचना मिली कि सेतु निर्माण का कार्य पूरी हो गई है।  हनुमान जी तभी ब्रज के ऊपर से गुजर रहे थे, उन्होंने गोवर्धन पर्वत को वहीं पर छोड़ दिया।

तब दुःखी मन से गोवर्धन पर्वत ने हनुमानजी से कहा कि- “प्रभु मुझसे क्या भूल हो गई, जो आप मुझे पुण्य कार्य के लिए नहीं ले जा रहे हैं।” तभी हनुमानजी ने प्रभु राम का ध्यान किया और  इस घटना का विस्तार कहा। उत्तर में प्रभु राम ने कहा कि, “गोवर्धन से कहो कि जब मैं द्वापर युग में कृष्ण अवतार में आउंगा तब मैं गोवर्धन को सात दिन और सात रातों तक अपनी अंगुली पर धारण करूंगा। फिर गोवर्धन की पूजा मेरे रूप में होने लगेगी”। यह सब सुनकर गोवर्धन खुशी से आह्लादित हो गये और श्री हरि की महिमा का गुणगान करने लगे।

गोवर्धन पर्वत का रहस्य पौराणिक कथा 4

गोवर्धन पर्वत से जुड़ी एक कहानी के अनुसार, ब्रजवासी वर्षा ऋतु के बाद यज्ञ करके इंद्र देवता का आभार व्यक्त करते थे। श्रीकृष्ण भगवान ने ब्रजवासियों का मार्ग दर्शन किया की वर्षा मेघों और गोवर्धन के कारण होती है। अतः वो इंद्र की पूजा ना करें, बल्कि पूजा करनी ही है तो गोवर्धन की करें। श्री कृष्ण का अनुसरण करते ब्रजवासीयों ने इंद्र की पूजा छोड़ गोवर्धन की पूजा करने लगे। कुपित होकर इंद्र देवता अति वृष्टि कर ब्रज बसियो को त्राहि-त्राहि कर दिया, पूरा ब्रज मंडल जल मग्न हो गया।

तब भगवान श्री कृष्ण इन्द्र का अहंकार चूर करने के लिए अपने हाथों की कनिष्ठा (सबसे छोटी ऊँगली) पर पूरे पर्वत को उठा लिए और सभी ब्रज बसियो को गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण दिया।

कहते हैं भगवान श्री कृष्ण ने 7 बर्ष की आयु में 7 दिन और  7 रात तक अपनी दाहिनी हाथ की कनिष्ठा ऊँगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाया। ब्रज, गोकुल और वृंदावन के सभी ग्वालों ने गोवर्धन के नीचे शरण ली।

अंततः इंद्र को हार माननी पड़ी और इंद्र भी श्री हरि के चरणों में क्षमा याचना करने लगे। श्री कृष्ण ने इंद्र को शिक्षा दी की समय पर वर्षा करना ये तुम्हारा कर्तव्य है और बिना किसी प्रतिफल के लालसा के अपना कर्तव्य करो। इस प्रकार ब्रज मंडल ही नहीं पूरे भारतवर्ष में गोप उत्सव और गोवर्धन पूजा की शुरुआत हुई।

गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा 21 कि.मी. की है, जिसे पूर्ण करने में 5 से 6 घंटे का समय लगता है। संपूर्ण भारत से भारी संख्या में  श्रद्धालु गोवर्धन की परिक्रमा करने आते हैं और भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद पाते हैं। गोवर्धन पूजा, गुरु पूर्णिमा, जन्माष्टमी और विशेष त्यौहारों पर हजारों-लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं।  श्रद्धालु परिक्रमा करते हुए यात्री राधे- राधे की जयकारे लगाते हैं।

गोवर्धन परिक्रमा करने का कोई नियत समय नहीं है। वैसे तो परिक्रमा कभी भी की जा सकती है और  परिक्रमा करने में 5-6 घंटे का समय लगता है। किंतु दण्डवत परिक्रमा करने वाले को एक सप्ताह का समय भी लग जाता है।

गोवर्धन परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले दर्शनीय स्थल

84 कोस में विस्तृत ब्रज मंडल में 250 सरोवर मौजूद है। जो राधारानी और कृष्णभगवान की लीलाओं से जुड़े हुए हैं। जब

गोवर्धन जी की परिक्रमा मार्ग में श्री कृष्ण और राधा जी के अनेक अलौकिक स्थान मिलते हैं। इनमें से मुख्य हैं-दान घाटी , ललिता कुंड, मानसी गंगा , अभय चक्रेस्वर मंदिर , सुरभी कुंड , कुसुम सरोवर, राधा कुंड,  पूछरी का लोटा, गोविन्द कुंड, जतीपुरा, संकर्षण कुंड, और गौरीकुंड आदि। इन सभी का अलग-अलग महत्त्व है ।  

गोवर्धन पर्वत की उत्पत्ति, परिक्रमा, रहस्य और पूजा संबंधी जानकारी आपको कैसी लगी कृप्या कमेंट करें।

जय श्री कृष्ण

अभिज्ञा

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