दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शक्ति पीठ छिन्नमस्तिका शक्तिपीठ रजरप्पा का संपूर्ण विवरण। दस महाविद्याओं का रहस्य। सिर कटी देवी का रहस्य

छिन्नमस्तिका देवी माता का विश्व प्रसिद्ध शक्ति पीठ झारखंड राज्य की राजधानी रांची से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर  रामगढ़ जिले (28 किमी दूर) के चितरपुर सामुदायिक विकास खंड में स्थित है।

रजरप्पा जलप्रपात दामोदर नदी और भैरवी नदी (भेड़ा नदी) का संगम पर स्थित है। यहाँ के झरने और माँ छिन्नमस्तिका का मंदिर आस्था और चमत्कार का केन्द्र है। आस्था के धरोहर यह मंदिर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शक्ति पीठ है।

असम स्थित मां कामाख्या देवी मंदिर दुनिया की सबसे बड़ी शक्तिपीठ है और रजरप्पा, झारखंड में स्थित छिन्नमस्तिका मंदिर, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शक्तिपीठ है।

रजरप्पा प्रांत के दो भाग हैं- रजरप्पा परियोजना और रजरप्पा मंदिर। रजरप्पा परियोजना जिसे रजरप्पा प्रोजेक्ट के नाम से जाना जाता है, वहाँ कोल इंडिया लिमिटेड की अनुषांगिक इकाइयों में से एक सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड (CCL) परियोजना है। यहाँ कोयले की खानें हैं, जहाँ खनन होता है।

  • छिन्नमस्तिका माता को अनेक नामों से पूजा जाता है, जैसे  छिन्नमस्ता, प्रचंड चंडिका, स्वयंभू देवी व चिंतपूर्णी माता आदि।
  • रजरप्पा का छिन्नमस्तिका मंदिर प्रचंडचंडिके मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।
  • माँ सती की दस महाविद्याओं में से माँ छिन्नमस्ता देवी, छठी महाविद्या हैं। इनका रूप अत्यंत भीषण उग्र रूप है।
  • छिन्नमस्तिका शब्द दो शब्दों के मेल से बना हैं जिसमें से छिन्न का अर्थ अलग होना हैं, और मस्तिका का अर्थ मस्तक या सिर से हैं। इस प्रकार छिन्नमस्ता का मतलब जिसका मस्तक अपने धड़ से अलग हो गया हो।
  • माता छिन्नमस्तिका देवी अपने एक हाथ अपना कटा हुआ सिर पकड़े हुए रहती हैं और उनकी गर्दन में से रक्त की तीन धाराएँ निकल रही होती है और दूसरे हाथ में खड्ग है।
  • अपने कटे हुए स्कन्ध से रक्त की तीन धाराएं निकलती हैं, उनमें से दो धाराओं से वो अपनी दो सहेलियों जया और विजया की भूख को शांत कर रही हैं और एक धारा को स्वयं पीती हैं।
  • देवी इडा, पिंगला और सुषुम्ना इन तीन नाडियों का संधान कर योग मार्ग में सिद्धि को प्रशस्त करती हैं। विद्यात्रयी में यह दूसरी विद्या गिनी जाती हैं।
  • मान्यता है कि छिन्नमस्तिका महाविद्या सकल चिंताओं का अंत करती हैं और मन में चिंतित हर कामना को पूरा करती हैं। इसलिए माता को चितपुर्णी भी कहा जाता है।
  • इस महाविद्या का संबंध महाप्रलय से है। महाप्रलय का ज्ञान कराने वाली यह महाविद्या भगवती पार्वती का ही रौद्र रूप है। सुप्रसिद्ध पौराणिक हयग्रीवोपाख्यान छिन्नमस्ता देवी से सम्बंधित है।
  • पुराणों में रजरप्पा मंदिर का उल्लेख शक्तिपीठ के रूप में मिलता है। मंदिर के निर्माण काल के बारे में पुरातात्विक विशेषज्ञों में मतभेद है।
  • कई विशेषज्ञ का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण 6000 साल पहले हुआ था और कई इसे महाभारतकालीन का मंदिर बताते हैं।

देवी का स्वरूप

  • देवी के गले में हड्डियों की माला तथा कन्धे पर यज्ञोपवीत है। छिन्नमस्ता माता का स्वरुप अत्यंत ही भीषण हैं।
  • यह माँ का उग्र रूप हैं, इसलिए उनके इस रूप को प्रचंड चंडिका भी कहा जाता हैं। माँ अपने अन्य उग्र रूपों में राक्षसों की कटी खोपड़ी हाथ में लिए रहती हैं जबकि इस रूप में उनके एक हाथ में स्वयं उनकी ही सिर रहती हैं।
  • माँ शिव शक्ति के विपरीत कामदेव-रति पर आसीन हैं। उनका वर्ण गुड़हल के समान लाल हैं तथा वस्त्रों के रूप में उन्होंने केवल आभूषण पहने हुए हैं।
  • गले में उन्होंने राक्षस की खोपड़ियों की माला पहने हुई हैं। कटे हुए सिर पर उन्होंने एक मुकुट पहना हुआ हैं जिसके तीन नेत्र हैं। माँ के दो हाथ हैं जिनमें से एक में खड्ग तथा दूसरे में अपना ही कटा हुआ सिर पकड़ा हुआ हैं। माँ ने कमरबंद के रूप में भी राक्षस की खोपड़ियों को बांधा हुआ हैं।
  • दिशाएं ही देवी के वस्त्र हैं। इनकी नाभि में योनि चक्र है। छिन्नमस्ता की साधना दीपावली से शुरू करनी चाहिए। इस मंत्र के चार लाख जप करने पर देवी सिद्ध होकर कृपा करती हैं। जप का दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन और मार्जन का दशांश दरिद्र और कन्या भोजन करना चाहिए।

माता छिन्नमसस्तिका और दस महाविद्या की कहानी

छिन्नमस्ता महाविद्या की कहानी इस प्रकार है कि, एक बार माता सती के पिता राजा दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन करवाया था।

देवी सती के पिता दक्ष प्रजापति भगवान शिव से द्वेष भावना रखते थे और अपनी पुत्री सती के द्वारा उनसे विवाह किये जाने के कारण रूष्ट थे, इसलिए उन्होंने बेटी पार्वती और जामाता शिव जी को इस यज्ञ में नही बुलाया। भगवान शिव इस बारे में जानते थे, किंतु माता सती इस बात से अनभिज्ञ थी।

जब माता सती ने सभी देवी-देवताओं व ऋषि-मुनियों को यज्ञ में जाते देखा तो अपने भगवान शिव से इसका कारण पूछा। भगवान शिव ने माता सती को सब सत्य बता दिया और निमंत्रण ना होने की बात कही। तब माता सती ने भगवान शिव से कहा कि एक पुत्री को अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए निमंत्रण की आवश्यकता नही होती है।

माता सती अकेले ही यज्ञ में जाना चाहती थी। इसके लिए उन्होंने अपने पति शिव से अनुमति मांगी किंतु शिव जी ने मना कर दिया। माता सती के द्वारा बार-बार आग्रह करने पर भी शिव नही माने तो माता सती को क्रोध आ गया और उन्होंने शिव को अपनी महत्ता दिखाने का निर्णय लिया।

तब माता सती ने भगवान शिव को अपने 10 रूपों के दर्शन दिए जिनमे से छठी छिन्नमस्ता देवी थी। मातारानी के यही 10 रूप दस महाविद्या कहलाए।

(दस महाविद्या: 1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4.भुवनेश्वरी, 5.त्रिपुर भैरवी, 6. छिन्नमस्तिका, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला)

प्रवृत्ति के अनुसार दस महाविद्या के तीन समूह हैं।

  1. सौम्य कोटि – त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, मातंगी, कमला
  • उग्र कोटि – काली, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी
  • सौम्य-उग्र कोटि – तारा और त्रिपुर भैरवी

 

क्या है माता के मस्तक कटे होने का रहस्य?

एक बार माता पार्वती अपनी दो सेविकाओं जया व विजया के साथ मंदाकिनी नदी पर स्नान करने गई थी। वहां स्नान करने के पश्चात तीनों को भूख लगी। दोनों सेविकाओं ने मातारानी से भोजन माँगा जिस पर माता पार्वती ने उन्हें प्रतीक्षा करने को कहा।

कुछ समय बाद भी जब उन्हें भोजन नही मिला तो मातारानी ने खड्ग से स्वयं का ही मस्तक धड़ से काटकर अलग कर दिया। मातारानी के धड़ से तीन रक्त की धाराएँ फूटकर निकली जिसमें से उनकी दोनों सेविकाओं ने रक्त पीकर अपनी भूख शांत की। इसी कारण मातारानी का यह रूप प्रचलन में आया।

माता छिन्नमस्ता देवी साधना और साधना मंत्र

माता छिन्नमस्तिका के शांत भाव से उपासना करने पर देवी अपने शांत स्वरूप को प्रकट करती हैं। उग्र रूप में उपासना करने पर यह उग्र रूप में दर्शन देती हैं, जिससे साधक के उच्चाटन होने का भय रहता है।

श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा।।

प्रतिदिन मंत्र जप के बाद देवी के लिए खीर, सूखे मेवे या नैवेद्य का भोग लगाना चाहिए।

माँ छिन्नमस्ता की भक्ति और पूजा लाभ

  • माँ छिन्नमस्ता के उग्र रूप के कारण इनकी पूजा साधरणतया तांत्रिकों द्वारा तंत्र व शक्ति विद्या अर्जित करने व अपने शत्रुओं को पराजित या संहार करने के उद्देश्य से की जाती हैं।
  • आम भक्तों को केवल इनकी भक्ति और उपासना करने की सलाह दी जाती हैं। आम भक्तों के लिए विशेष रूप से पूजा या साधना की मनाही है।
  • तांत्रिकों व साधुओं के द्वारा माँ छिन्नमस्ता की पूजा करने के पीछे अपने शत्रुओं का समूल नाश होता है। भय को दूर करने व विपत्तियों को समाप्त करने के लिए किया जाता हैं।
  • मंगलवार और शनिवार को रजरप्पा मंदिर में विशेष पूजा होती है।
  • माँ छिन्नमस्ता की कृपा से भक्तों पर आई विपत्ति व संकट दूर होते हैं तथा उनका मार्ग प्रशस्त होता हैं।
  • देवी छिन्नमस्ता महाविद्या की पूजा मुख्य रूप से गुप्त नवरात्रि में की जाती हैं। गुप्त नवरात्रों में मातारानी की सभी दस महाविद्याओं की पूजा की जाती हैं। इसमें छठे दिन महाविद्या छिन्नमस्ता देवी की पूजा करने का विधान हैं।
  • छिन्नमस्तिका मंदिर का विवरण वेदों और पुराणों में पाया जाता है और इसे शक्ति और भक्ति का एक प्राचीन और मजबूत धरोहर माना जाता है।
  • माता छिन्नमस्तिका को पवित्र हृदय से भक्ति करता है, माता दर्शन मात्र से उसकी सारी इच्छाएं देवी मां पूरी की करती हैं।
  • मुख्यतःझारखंड, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के सभी प्रांतों से भक्तजन वर्ष भर इस पावन तीर्थ स्थान पर माता के दर्शन हेतु आते और श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। शारदीय और चैत्र में भक्तोंका तांता लगा रहता है। यहां बड़े पैमाने पर विवाह भी होता हैं।
  • रजरप्पा मंदिर की कला और वास्तुकला असम के प्रसिद्ध कामख्या मंदिर से मेल होती है। यहां, मां काली के मंदिर के अलावा, विभिन्न देवताओं और देवी-देवताओं जैसे सूर्य भगवान और भगवान शिवा के दस मंदिर मौजूद हैं।
  • मंदिर की उत्तरी दीवार के साथ रखे एक शिलाखंड पर दक्षिण की ओर रुख किए माता छिन्नमस्तिके का दिव्य रूप अंकित है। विशेषज्ञों के अनुसार यह मंदिर 6000 वर्ष पहले बना है। कुछ इसे महाभारत कालीन बताते हैं।
  • यहाँ कई मंदिर हैं जिनमें ‘अष्टामंत्रिका’ और ‘दक्षिण काली’ प्रमुख हैं। यहां तांत्रिक तंत्र साधना का करते हैं।

देवी छिन्नमस्तिका मंदिर जाने के मार्ग

सड़क मार्ग – रांची रोड लगभग 70 किमी

रेलवे स्टेशन – रामगढ़ कैंट स्टेशन (निकटतम) 28 किमी

हवाई अड्डा – बिरसा मुंडा एयरपोर्ट, रांची (70 किमी लगभग)

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