आस्था का प्रतीक प्राचीन देवड़ी मंदिर (700 वर्ष पुराना मंदिर, रांची, झारखंड)

प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की विरासत समेटी भारत भूमि अध्यात्म और आस्था की जननी है। मंदिरों की इस पवित्र भारत भूमि में ऐसा ही एक प्राचीन दुर्गा माता का पवित्र मंदिर झारखंड राज्य में है।

झारखंड की राजधानी रांची से तकरीबन 60 किमी दूर (दक्षिणी दिशा की ओर) तमाड़ गांव में जमशेदपुर-रांची हाईवे (NH- 33) में स्थित है। आस्था और श्रद्धा का प्रतीक प्राचीन देवड़ी मंदिर तकरीबन दो एकड़ में फैला है।

मां देवड़ी का यह मंदिर देवी दुर्गा के अवतार सोलह भुजी देवी को समर्पित है। देउड़ी देवी के इस मंदिर में देवी काली की 3.5 फुट (लगभग) ऊंची सोलह भुजी प्रतिमा सोलह शस्त्र धनुष, ढाल, फूल और परम  आदि धारण किए हुए है। देवड़ी माता की प्रतिमा स्वर्णाभूषण से अलंकृत हैं। गर्भगृह में मां देउड़ी देवी की प्रतिमा स्थापित है। यहां भगवान शिवजी और गणेश जी की भी प्रतिमा स्थापित है।

क्यों मशहूर है देउड़ी मंदिर?

इस मंदिर में श्रद्धालुओं की हर मनोकामना पूर्ण होती है, इसीलिए झारखंड ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में यह मंदिर विख्यात हो गया है। इस मंदिर में भक्तों का साल भर तांता लगा रहता है।

पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी और उनके परिवार की मां देवड़ी पर विशेष आस्था है। कहते हैं, महेंद्र सिंह धोनी किसी भी महत्वपूर्ण सीरीज से पहले मां देउड़ी का आशीर्वाद लेते हैं और जीत के बाद भी जाते हैं। साल 2011, वर्ल्ड कप क्रिकेट सीरीज के पूर्व और जीत के बाद भी पूर्व कैप्टन धोनी मां देउड़ी के दरबार में शीश नवाने गए थे।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव, क्रिकेटर शिखर धवन, राजनीतिक शख्सियतों और अन्य कई मशहूर हस्ती ने मां देउड़ी के आशीर्वाद को पाया है।

देउड़ी मंदिर में भक्तजन अपनी मनोकामना की पूरी करने हेतु  बांस पर पीले और लाल रंग के पवित्र मन्नत के धागे बांधते हैं। मन्नत पूरी होने पर वे फिर से मंदिर आते हैं और धागा खोल देते हैं।

मंदिर की स्थापत्य कला

प्राचीन मंदिर का निर्माण चाक या बाध्यकारी सामग्री का उपयोग किए बिना पत्थरों को आपस में जोड़कर किया गया था। इस मंदिर के दरवाजे पत्थर के बने हैं। साधारणतः मंदिरों में देवी की अष्टभुजी मूर्ति होती है, लेकिन इस मंदिर में देवी मां की सोलह भुजी मूर्ति विराजमान है।

माँ दुर्गा की इस मंदिर का निर्माण काफी सालों पहले हुआ है, इस मंदिर को पत्थरों से जोड़-जोड़ कर बनाया गया है। मुख्य मंदिर सीमेंट और पिलरों से नहीं बनाया गया है |

किंवदंतियों के अनुसार, माता के मुख्य मंदिर को यथावत् रखा गया है। क्योंकि देवी के मुख्य मंदिर की संरचना को जिसनें भी बदलने की कोशिश की है, उसे देवी के कोप का सामना करना पड़ा है। इसीलिए मुख्य मंदिर को छोड़कर, मंदिर के बाकी भाग का नवीनीकरण बेहद खूबसूरत ढंग से किया गया है। मंदिर की दीवारों की नक्काशी और रंग-बिरंगे कलाकृतियां देखते ही बनती है और झारखंड राज्य की महान संस्कृति की महिमा गीत गाती है।

इस मंदिर की मूर्ति की वास्तुकला शैली उड़ीसा के मंदिरों में पाए जाने वाले मूर्ति के समान है। मंदिर की भव्य वास्तुकला पर्यटकों का मनमोह लेती है

मंदिर से जुड़ी दंत कथाएं

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस मंदिर की स्थापना सिंहभूम के आदिवासी (मुंडा) राजा केरा ने 1300 ई. (मध्यकाल) में किया। कहते हैं, राजा ने युद्ध में परास्त होकर लौटते हुए मंदिर की स्थापना की। राजा को देवी ने सपने में मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया था। मंदिर के स्थापना के बाद मां काली के आशीर्वाद से राजा को अपना खोया राज्य वापस मिल गया था।

अन्य मान्यता के अनुसार कि, इस मंदिर का निर्माण सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध (वर्तमान उड़ीसा) अभियान के दौरान बनवाया था।

कितना प्राचीन है यह मंदिर?

मंदिर के निर्माण संबंधित अलग-अलग मान्यताएं हैं, कुछ इसे 10 वीं से 12 वीं शताब्दी के बीच का तो कोई कुछ 700 साल पुराना बताते हैं। यहाँ तक की कुछ इस मंदिर को 5000 साल पुराना भी बताते हैं। किंतु यह मंदिर कितना पुराना है इसका सही ज्ञान किसी को नहीं है। यह मंदिर झारखंड की समृद्ध विरासत का जीवंत उदाहरण है।

मंदिर पर आदिवासी संस्कृति (विशेषकर भूमिज जनजाति) का प्रभाव है। यह मंदिर को आदिवासी और हिन्दू संस्कृति के संगम का अद्भुत उदाहरण है, क्योंकि इस मंदिर के पुजारी पाहन (आदिवासी पुजारी) होते हैं, जो हफ्ते में छ: दिन माता की पूजा-अनुष्ठान करते हैं, सिर्फ मंगलवार को ब्राह्मण पुजारी (पंडे) देवी मां की पूजा अर्चना करते हैं।

मंदिर के परिसर में हरियाली, सौम्यता और शांति का वातावरण है, काफी पेड़ -पौधे है | मंदिर के परिसर में हीं पूजा की सारी सामग्री उपलब्ध हैं।

दशहरा और होली का पर्व यहाँ विशेष धूमधाम और उत्साह से मनाया जाता है। दशहरा में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। नवरात्रि में यहाँ मेला जैसा लगता है।

 

देवड़ी मंदिर पूजा का समय :  5.00 am से 8.00 pm

देउड़ी मंदिर दर्शन करने का मार्ग:  

1. रांची से देवड़ी मंदिर 60 किलोमीटर पर स्थित है | 

2. रांची रेलवे स्टेशन से देवड़ी मंदिर 55 . 9 किलोमीटर पर है | 

4. बिरसा मुंडा एयरपोर्ट (रांची) से देवड़ी मंदिर की दूरी 62 किलोमीटर  है | 

5. रांची बस स्टैंड (खादगड़ा बस स्टैंड) से देवड़ी मंदिर की दूरी  59 km है | 

6.  टाटानगर जंक्शन से देउड़ी मंदिर की दूरी 74 किलोमीटर है

7. जमशेदपुर बस स्टैंड (मानगो) से देउड़ी मंदिर 67. 9 किलोमीटर (NH 43 से होकर) है।

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