मकर संक्रांति पर्व क्यों मनाते हैं?/ स्नानदान महत्त्व/ गंगा दशहरा की पौराणिक कथा/ विभिन्न प्रांतों में मकर संक्रांति

उत्सवों का देश भारत जहां समय-समय पर हर पर्वत्यौहार को श्रद्धा, आस्था और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पर्वत्योहार सभ्यता का आईना होते हैं, भारत में पर्वत्यौहार और उत्सव का विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग ढंग से मनाने का रिवाज है।

मकर संक्रांति का पर्व भारत में विशेष महत्व रखता है। संत तुलसीदास रामचरितमानस मेंहते हैं

माघ मकरगत रवि जब होई।

तीरथपतिहिं आव सब कोई।।

मतलब मकर संक्रांति के पर्व के दिन गंगा, यमुना और सरस्वती नदी के संगम पर प्रयाग में सभी देवीदेवता अपनाअपना स्वरूप बदल कर स्नान करने आते हैं। इसीलिए इस दिन संगम स्नान का बहुत ही पुण्य और महत्व है।

  • मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपनी कक्षा में परिवर्तन कर दक्षिणायन से उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। जिस राशि में सूर्य की कक्षा का परिवर्तन होता है, उसे संक्रमण या संक्रांति कहते हैं। इसीलिए प्रायः प्रतिवर्ष 14 या 15 जनवरी को मकर संक्रांति दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • मकर संक्रांति भारत के विभिन्न राज्यों में अलगअलग नामों और प्रथाओं से किया जाता है। मसलन असम में बिहू, पंजाब में लोहड़ी,  दक्षिण भारत में पोंगल, गुजरात में उत्तरायण, झारखंड में टूसू, उत्तर प्रदेशबिहार खिचड़ी इत्यादि।
  • मकर संक्रांति के दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं। शास्त्रानुसार उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। इसलिए मकरसंक्रांति एक प्रकार से देवताओं का प्रभातकाल है।
  • भारतीय ज्योतिष के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य एक राशि से दूसरी राशि परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर परिवर्तन माना जाता है। मकर संक्रांति के दिन से दिन बढ़ने लगते हैं और रात्रि की अवधि कम होने लगती है। इस दिन से दिन बड़ा होने लगता है और प्रकाश अधिक होती है और रात्रि के अंधकार कम हो जाती है। सूर्य ऊर्जा का स्रोत है, सूर्य को प्राणी जगत में चेतना और उसकी कार्य शक्ति में वृद्धि होती है। इसलिए हमारी संस्कृति में मकर संक्रांति पर्व का विशेष स्थान है।
  • मकर संक्रांति के पर्व में स्नानदान का विशेष महत्व है। हमारे धर्म ग्रंथों में स्नान को स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभदायक और महत्वपूर्ण माना गया है। मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं, तो गर्मी के मौसम का आरंभ हो जाता है। इसलिए उस समय स्नान करना स्वास्थ्यकर होता है।
  • इस दिन स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध और अनुष्ठान आदि का अत्यधिक महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि, इस अवसर पर किये। दान का सौ गुना फल प्राप्त होता है।
  • उत्तर भारत में गंगायमुना नदी के किनारे बसे नगरों में भव्य मेलों का आयोजन होता है। उत्तर भारत में सबसे प्रसिद्ध मेला पश्चिम बंगाल में मकर संक्रांति के पर्व पर गंगासागर में लगता है, गंगासागर के मेले के पीछे प्रचलित पौराणिक कथा है:

गंगा दशहरा मेले की पौराणिक कथा और भारत के विभिन्न प्रांतों में मकर संक्रांति कैसे मनाते हैं?

मकर संक्रांति को गंगा जी स्वर्ग से उतर कर, भगीरथ मुनि के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम में जाकर सागर में मिल गई। गंगा जी के पावन जल से राजा सगर के साठ हजार शापग्रस्त पुत्रों का उद्धार हुआ था। इस घटना की स्मृति में गंगासागर नाम से विख्यात हुआ। 14 जनवरी को गंगा सागर में मेले का आयोजन होता है। इसके अतिरिक्त दक्षिण बिहार के मदार क्षेत्र में भी मेला लगता है।

  • इलाहाबाद के संगम स्थल पर भी प्रति वर्ष एक महीने तक माघी मेला लगता है जहां भक्तगण कल्पवासरते हैं। यहां 12 वर्ष में कुंभ का मेला अति भव्य मेला लगता है, एक महीने तक रहता है। इसी तरह छः सालों में अर्धकुंभ का मेला लगता है।
  • महाराष्ट्र और देश के कई प्रांतों में मान्यता है कि, मकर संक्रांति से सूर्य की गति तिलतिल कर बढ़ती है। ऐसा मान्यता है कि, इसलिए इस दिन तिल के विभिन्न मिष्ठान बनाकर एक दूसरे को दान करते हुए बांटते हुए शुभकामनाएं लेकर या त्यौहार मनाया जाता है।
  • महाराष्ट्र और गुजरात में मकर संक्रांति के पर्व पर अनेक खेलप्रतियोगिताओं का आयोजन होता है और पतंग उड़ाने का भी चलन है। इस पर्व को गुजरात में उत्तरायन के तौर पर मनाते हैं।
  • महाराष्ट्र में विवाहित स्त्रियां पहले संक्रांति पर तिल, तेल कपास और नमक आदि वस्तुएं सौभाग्यवती स्त्रियों प्रदान करती है।
  • पंजाब और जम्मू कश्मीर में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी नाम से मनाया जाता है। एक प्रचलित लोक कथा है कि, मकर संक्रांति के दिन कंस ने भगवान श्री कृष्ण को मारने के लिए लोहिता नाम की राक्षसी को गोकुल भेजा था। जिसमें खेलखेल में श्री कृष्ण जी ने उस राक्षसी को मार दिया। तब से विजय पर्व के तौर पर लोहड़ी पर्व पावन पर्व मनाया जाता है।
  • सिंधी समाज में भी मकर संक्रांति के दिन पहले उसे लाल लोही के नाम से मनाया जाता है।
  • दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति को पोंगल के रूप में मनाने का रिवाज है। इस दिन तिल के मिष्ठान और चावलदाल की खिचड़ी बनाई जाती है। नई फसल चावल, दाल, तिल के खाने के पकवान बनाकर पूजा करते हैं और कृषि देवता को अर्पित कर अपनी कृतज्ञता सकट की जाती है। तमिल पंचांग का नया वर्ष पोंगल से शुरू होता है।
  • असम में बिहू और झारखंड ,ड़ीसा और पश्चिम बंगाल के जनजातीय लोगों ने मकर संक्रांति को टूसू पर्व के रूप में मनाने का प्रचलन है। झारखंड के जनजाति निवासी विभिन्न प्रकार के चावल से बनी पकवान बनाते हैं और सभी जन मिलकर छऊ लोक नृत्य करते हैं
  • बिहार और उत्तर प्रदेश इस व्रत को खिचड़ी भी कहते हैं। इसलिए इस दिन खिचड़ी खाने का और खिचड़ीतिल दान करने का विशेष महत्व है।
  • बंगाल में इस दिन स्नान करके तिल दान करने का विशेष प्रचलन है।
  • राजस्थान में इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां तिल के लड्डू, घेवर और मोतीचूर के लड्डू बनाती है और उसपर रूपये रखकर वायने के रूप में अपनी सास को प्रणाम कर देती है। फिर किसी भी वस्तु का 14 संख्या में संकल्प कर 14 दरिद्र नारायण दान देती हैं।

मकर संक्रांति और स्नानदान का महत्व

“माघे मासे महादेव यो दद्दाद् घृतकम्बलम्।

स भुक्त्वा सकलान् भोगान् अन्ते मोक्षं च विन्दति”।।

  • इस दिन घी और कम्बल के दान का विशेष महत्व है। इस दिन घी और कम्बल दान करने वाला सम्पूर्ण भोगों को भोग कर मोक्ष को प्राप्त होता है।
  • इस दिन गंगा स्नान और गंगा तट पर दान की विशेष महिमा है। तीर्थ राज प्रयाग और गंगासागर का मकर संक्रांति का पर्व स्नान बहुत ही प्रसिद्ध है।

इस प्रकार भारत के विभिन्न प्रांतों में नये फसलों के कटने की खुशी मनाने और विभिन्न पौराणिक महत्वों का अनुसरण करते हुए संपूर्ण देशवासी अपनीअपनी प्रथा और परंपरा का निर्वाह करते हुए हर्षोल्लास से मकर संक्रांति का त्यौहार मनाते हैं।

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