सावित्री बाई फुले (1831-1897)

दकियानूसी परंपराओं को तोड़ हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था, कुरीतियों, शूद्रों-अतिशूद्रों के साथ अन्याय और महिलाओं की स्थिति को आधुनिक भारत में पहली बार जिस महिला ने चुनौती दी, उनका नाम सावित्रीबाई फुले है।

भारत की प्रथम महिला शिक्षिका और महान समाज सुधारक राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले की 190 वीं जयंती 3 जनवरी को मनायी गयी। उनका जन्म 3 जनवरी, 1831 ई. को महाराष्ट्र के पुणे के नजदीक, सतारा जिले में स्थित गांव ‘नाय’ गांव में हुआ था। सावित्री बाई के पिता का नाम खंडोजी नेवसे था, जो शूद्र जाति के थे। उस जमाने में शूद्र जाति में पैदा किसी लड़की के लिए, शिक्षा पाने का अधिकार नहीं था, इसलिए वह घर और खेती के कामों में अपने माता- पिता का सहयोग करती थीं।

19वीं शताब्दी में उनके द्वारा किये गए साहसिक कार्य आज 21वीं सदी में भी उतनी ही प्रासंगिक है। यह आश्चर्य और गर्व की बात है कि भारत की मिट्टी में इतनी महान देवी की जन्मभूमि है। आधुनिक भारत के इतिहास में वह पहली आधुनिक महिला थीं जिसने अंधकार में डूबे समाज को शिक्षा की ज्योत से रौशन किया। ज्योतिराव फुले की जीवन संगिनी होने के साथ ही उन्होंने अपने व्यक्तित्व से अपनी अलग पहचान एवं स्थान बनाया। सावित्रीबाई फूले कहती थी :

हमारे जानी दुश्मन का नाम अज्ञान है, उस धर दबोचो, मजबूत पकड़कर पीटो और उसे जीवन से भगा दो।

वर्ण व्यवस्था के नाम पर समाज के एक तबके को दकियानूसी परंपराओं में जकड़ और शिक्षा से वंचित रखने के क्रूर कृत्य सदियों से किया जा रहा था।ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के नामक फुले दंपति का जिनका जिक्र भारत के इतिहास में बहुत कम शब्दों में आता है; ने धारा के विपरीत जाकर पिछड़ो, गरीबों , वंचितों और विधवाओं मे शिक्षा की लौ जलाया।

किताब से पहला परिचय विदेशी मिशनरी लोगों द्वारा बांटी जा रही ईसा मसीह के जीवन से संबंधित पुस्तिका के रूप में हुई। एक बार सावित्री अपने गांव के पास लगाने वाले साप्ताहिक बाजार शिवाल में गांव के लोगों के साथ गई थीं। रास्ते में कुछ विदेशी महिलाएं और पुरुष एक पेड़ के नीचे ईसा मसीह को प्रार्थना कर रहे थे। वे कौतूहलवश वहां रुक गईं और उन्हीं में से किसी महिला या पुरुष ने उनके हाथ में एक किताब थमा दी। सावित्रीबाई किताब लेने से हिचकिचायी तो देने वाले ने कहा, यदि तुम्हें पढ़ना नहीं भी आता है, तो तुम इसमें छपे चित्रों को देखना। इस तरह सावित्रीबाई को पहली बार कोई पुस्तक देखने को मिला, उन्होंने संभाल कर रख लिया।

‘9’ वर्ष की आयु (1840) में उनकी शादी ‘13’ वर्षीय ज्योतिराव फुले के साथ हुई और वह अपने घर से ससुराल आईं तो यह पुस्तिका भी साथ ले आईं। ज्योतिराव फुले भी तब नाबालिक ही थे। बाल विवाह की कुप्रथा उस समय समाज में प्रचलित थी। सावित्री बाई फूले के पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले (जन्म 11 अप्रैल, 1827, मृत्यु-28 नवंबर, 1890) आगे जाकर एक विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक, तथा क्रांतिकारी कार्यकर्ता बने। ज्योतिराव फुले ब्राह्मण जाति वर्ण व्यवस्था के हिसाब से शूद्र वर्ण और माली जाति के थे।

आधुनिक भारत के पुनर्जागरण के दो केंद्र रहे हैं- बंगाल और महाराष्ट्र। महाराष्ट्र के पुनर्जागरण के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति ज्योतिबाई फुले थे। महाराष्ट्र में ज्योतिराव और सावित्रीबाई फूले सरीखे समाज सुधारक ने हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था कुरीतियों और गलत परंपराओं के विरुद्ध समाज सुधार का बिगुल फूंका। वर्ण-जाति व्यवस्था को तोड़ने और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व के खात्मे के लिए संघर्ष किया। ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, पंडित रमाबाई और ताराबाई शिंदे इसकी अगुवाई कर रहे थे।

ज्योतिराव के पूर्वज सतारा के कप्तगुल गांव में रहते थे और खेती करते थे। उनके परिवार ने माली के काम में महारत हासिल की। उनकी ख्याति पेशवाओं तक पहुंची और उन्हें पेशवाओं की फुलवारी में काम मिला। उनके काम से प्रसन्न होकर पेशवा ने उन्हें 35 एकड़ जमीन ईनाम में दे दी। यहां गोविंद राव को फूले लोग कहने लगे। ज्योतिराव जब साल भर के थे, तभी उनकी मां का निधन हो गया। पिता गोविंदराव ने पुत्र के पालन के लिए सगुणाबाई को। रखा।

ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले की शिक्षा-दीक्षा में सगुणाबाई की अहम भूमिका है। वस्तुतः सगुणाबाई ने ही ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले को गढ़ा था। उनको याद करते हुए सावित्रीबाई फुले ने कविता लिखी है, जिसमें वे उनके प्यार, मेहनत, त्याग और ज्ञान की प्रशंसा की है। उन्हें मां कहकर संबोधित किया है।

1848 ई. में ज्योतिराव फुले ने अछूत कही जाने वाली लड़कियों के लिए स्कूल खोला तो उस स्कूल में 17 वर्षीय सावित्रीबाई के साथ सगुणाबाई और फातिमा शेख भी शिक्षक नियुक्त हुई थीं। ज्योतिबा फुले अशिक्षा को ही समाज में फैली असमानता रूढिवादिता और अनर्थ की जननी मानते थे, इसलिए उन्होंने सगुणाबाई के साथ मिलकर सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सिखाया।

ज्योतिराव और सगुणाबाई के देख-रेख में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद सावित्रीबाई फुले ने औपचारिक शिक्षा अहमदनगर में ग्रहण की। उसके बाद उन्होंने पुणे के अध्यापक प्रशिक्षण संस्थान से प्रशिक्षण लिया। यहां उनकी सहपाठी फातिमा शेख से उनकी गहरी मित्रता कायम हुई। फातिमा के भाई उस्मान शेख, ज्योतिराव फुले के घनिष्ठ मित्र व सहयोगी थे। बाद में उन दोनों ने अध्यापन का कार्य किया।

सावित्री बाई शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, समानता, अधिकार, विधवा पुनर्विवा, सती प्रथा और कन्या शिशु हत्या के विरूद्ध कड़़ा संघर्ष किया।

1848 ई. को पूना के भिडेवाला में ज्योतिराव ने लड़कियों के लिए स्कूल खोला, इस स्कूल की अध्यापिका सावित्रीबाई फुले, इनके साथ सगुणाबाई और फातिमा शेख भी उस स्कूल की सहायक अध्यापिका बनी। सावित्रीबाई, सगुणाबाई और फातिमा शेख पहली भारतीय महिलाएं थीं जो अध्यापिकाएं बनीं। जब वो स्कूल जाती थी, तो लोग पत्थर मारते और गंदगी फेंकते थे। गंदगी फेंकने वाले उच्च जाति लोगों की सोच थी, कि शूद्रो और बालिकाओं को पढ़ने का अधिकार नहीं है। ये तमाम अवरोध भी उनके दृढ़ निश्चय को डिगा ना पाया।

लड़कियों के स्कूल खोलने के विषय में ज्योतिराव फुले के विचार था लड़कों के स्कूल के बजाए लड़कियों का स्कूल ज्यादा जरूरी है क्योंकि, शिक्षित महिलाएं बच्चों में शिक्षा और संस्कार का बीजारोपण करती हैं, वही संस्कार बच्चों के भविष्य के बीज होते हैं।

ज्योतिराव फूले और सावित्रीबाई द्वारा शूद्रों-अति शूद्रों और महिलाओं के लिए 1852 तक (4 वर्षों में) 18 विद्यालय खोले। फुले दम्पत्ति का यह काम ब्राह्मणवाद को चुनौती थी। उच्च वर्ग के लोगों ने ज्योतिराव के पिता गोविंदराव पर यह दबाव बनाया कि वे इन स्कूलों को बंद करा दें अथवा ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी को घर से निकाल दें। ज्योतिराव ने भारी मन से सावित्रीबाई फुले के साथ घर छोड़ दिया और सामाजिक हित के अपने कार्यों को जारी रखा।

1852 ई. में सावित्रीबाई फुले को आदर्श शिक्षक का पुरस्कार प्राप्त हुआ था। फुले दम्पति ने 19 वीं सदी में अशिक्षा, छूआछूत, बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह निषेध, नारी अशिक्षा जैसी कुरीतियों पर कुठाराघात किया। धारा के विपरीत जा कर समाज में पुनर्जागरण की मशाल जलायी। महिलाओं को सिर्फ शिक्षित करना ही सिर्फ उनका उद्देश्य नहीं था वरन् महिलाओं को सभी क्षेत्रों में बराबरी के अधिकार मिले इसके लिए वे सदैव प्रयासरत रहे। इसके लिए उन्होंने 1873 ‘सत्य शोधक समाज’ की स्थापना की।

सावित्रीबाई मराठी कवियित्री भी थीं। 23 वर्ष की आयु में सावित्रीबाई फुले का पहला काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की कविताएं शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की भावनाओं को अभिव्यक्ति करती हैं। सावित्रीबाई अपनी कविताओं के माध्यम से ब्राह्मणवाद-असमानता-रूढिवादिता पर करारी चोट करती हैं। वो अंग्रेजी शिक्षा के महत्वपूर्ण और ब्राह्मणलिखित इतिहास को सिरे से खारिज करती हैं। उनके कविताओं में समाज नवनिर्माण सपनें रेखांकित हैं, जिसमें समाज अन्याय, वर्ण, जाति व्यवस्था मुक्त हो और महिलाओं का स्थान पुरूषों के बराबर हो। सावित्री बाई कहती हैं

जाओ जाकर पढो़-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती

काम करो , ज्ञान और धन इक्कठा करो

ज्ञान के बिना सब खो जाता है, ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते हैं

इसलिए, खाली ना बठो, जाओ जाकर शिक्षा लो

दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो,

तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है

इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो, ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो।

शिक्षा के साथ ही फुले दम्पति ने समाज के सर्वांगीण विकास के लिए समाज के अन्य समस्याओं के सुधार के लिए भी कदम उठाए। समाज में विधवाओं के हालात पशु सदृश्य थी, उनका दुबारा विवाह नहीं हो सकता या समाज में उन्हें अशुभ समझा जाता था। रंगीन वस्त्र पहनने, शादी-ब्याह तथा किसी शुभ कार्य में इन्हें शामिल होने का अधिकार नहीं था यहां तक कि इन्हें स्वादिष्ट भोजन की मनाही थी। ये सफेद तथा भगवा वस्त्र पहनने की इजाजत थी। इनके बाल मुंड दिये जाते थे, कई बार विधवाएं अपने परिवार और अपने सगे संबंधियों के हवस का शिकार हो जाती थीं । परिणामस्वरूप यदि वे गर्भवती हो जाती थीं, तो वे आत्महत्या कर लेती या बच्चे के जन्म देने के बाद उसकी हत्या कर देती।’’

एक विधवा महिला के साथ भी यही हुआ। बलात्कार की शिकार वह महिला गर्भवती हो गईं। उसने एक बच्चे को जन्म दिया। लोकलाज के भय से उसने अपने बच्चे को कुएं में फेंक दिया। उन पर हत्या का मुकदमा चला और 1863 ई. में उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई।

इस घटना ने फुले दम्पति झकझोर दिया। समाज में व्याप्त इस समस्या के समाधान हेतु फूले दंपत्ति ने 1863 ई. में उन्होंने ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ शुरू किया। यहां आकर कोई भी विधवा अपने बच्चों को जन्म दे सकती थी और उसका नाम गुप्त रखा जाता था। सावित्रीबाई फुले बाल हत्या प्रतिबंधक गृह ने आने वाली महिलाओं और पैदा होने वाले बच्चों की देख-रेख खुद करती थी।

1879 ई. में ऐसी ही एक विधवा ब्राह्मण गर्भवती महिला काशी बाई, जो अपना जीवन समाप्त करना चाहती थी। उसे ज्योतिराव फुले समझा कर अपने घर लाए और उसने एक बच्चे को जन्म दिया। निःसंतान फुले दम्पति के इस बच्चे को गोद ले लिया, बच्चे का नाम यशवंतराव फूले रखा गया और उसे अपना कानूनी उत्तराधिकारी घोषित किया।

समाज में पिछड़ी जातियों को पानी की समस्या से रोजाना जूझना पड़ता था। शूद्रों-अतिशूद्रों को पीने के पानी के लिए थी तपती दोपहरी में वे पानी के लिए पैदल चल कर थक जाते थे। लेकिन उन्हें एक घूंट पानी मिलना मुश्किल हो जाता था। फुले दम्पति ने 1861 में अपने घर के पानी का हौज इन जातियों के लिए बनवाया। उन्होंने घोषणा किया, कोई भी, किसी भी समय यहां आकर पानी पी सकता है।

‘सत्य शोधक समाज’ संस्था शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति के लिए संघर्ष करने के साथ ही अन्य सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हिस्सेदारी और सहयोग करता था। सन् 1876-77 में महाराष्ट्र में अकाल पड़ा तो सत्यशोधक समाज अकाल पीड़ितों को राहत पहुंचाने में जुट गया। फुले दम्पति ने अकाल में अनाथ हुए बच्चों के लिए 52 स्कूल खोले। जहां बच्चों के रहने, खाने-पीने और पढ़ने की व्यवस्था थी।

28 नवंबर 1890 ई. को उनके पति ज्योतिराव  फुले का निधन हो गया। स्वतन्त्र और साहसिक सोच की अग्रदूती सावित्री बाई ने स्वयं अपने पति को मुखाग्नि देने का क्रांतिकारी निर्णय किया। 190 साल पहले किसी भी हिंदू स्त्री के लिए यह अति साहसिक और क्रांतिकारी कदम था, आज भी ऐसा साहस स्त्रियों के लिये दुर्लभ है।

ज्योतिराव फुले की मृत्यु के बाद सत्यशोधक समाज की बागडोर सावित्रीबाई फुले ने संभाला और 1877 ई. तक उन्होंने इसका नेतृत्व किया। 1891 ई. सावित्रीबाई का दूसरा काव्य संग्रह ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ प्रकाशित हुआ। कविता संग्रह के अतिरिक्त, सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिराव फुले के चार भाषणों का संपादन भी किया। ये चारों भाषण भारतीय इतिहास पर हैं। सावित्रीबाई फुले के भाषण 1892 ई. में प्रकाशित हुए। इसके अलावा उनके द्वारा लिखे कई महत्वपूर्ण पत्र भी है, जो समय की परिस्थितियों, लोगों की सोच, फुले के प्रति सावित्रीबाई की सोच और उनके विचारों को सामने लाते हैं।

1896 ई. में फिर से पूना और आस-पास के क्षेत्रों में अकाल पड़ा। सावित्रीबाई फुले ने अकाल पीड़ितों की हरसंभव मदद की। 1897 ई. में पूना में प्लेग की महामारी फैल गई, एक बार फिर वे पीड़ितों की सेवा में और उनकी चिकित्सा में सावित्री बाई और यशवंत राव ने दिन-रात एक कर दिया। बाद में वो भी इसी बीमारी का शिकार हो गईं। 10 मार्च 1897 ई. को उनका देहांत हो गया। किंतु उनकी मृत्यु के बाद भी उनके ज्ञान, कार्य और विचार की लौ आज भी समाज का मार्गदर्शन कर रही है

माता सावित्री बाई की जीवनी हर भारतीय को गर्व से भर देता है। वह इस देश की महानायिका थीं।जिस समाज में महिला से पशुवत व्यवहार होता था, उसके खिलाफ समानता की रणभेरी बजाने वाली देवी को कोटि-कोटि नमन्ः

जय हिंद

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