ऋषि पंचमी का महत्व, व्रत विधि और कथा

षि पंचमी ( भाद्रपद शुक्ल पंचमी)

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि ‘ऋषि पंचमी’ कहलाती है। और इस दिन किये जाने वाले व्रत को ऋषि पंचमी-व्रत कहते हैं। इस व्रत में सभी ऋषियों सहित माता अरूंधति का भी पूजन होता है। समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों के शमन हेतु स्त्री-पुरुष इस व्रत को करते हैं।

जो आदमी अपनी स्वयं की चिंता छोड़ कर दूसरों चिंतन में अपना सारा जीवन लगाता है वह ऋषि है। ऐसे ऋषि बड़े भाग्य से ही किसी देश या समाज में होते हैं।

जैसे एक विशाल घना वृक्ष वर्षों विभिन्न प्रकार के झंझावात, कष्ट और प्रकृति के थपेड़ों को झेलता हुआ धीरे-धीरे बढ़ता है और फल, फूल, शुद्ध हवा और घनी छांव देकर जगत कल्याण का भागीदार बनता है। ठीक वैसे ही एक महान, सत्यनिष्ठ, उदार चरित्र वाले ऋषि भी समाज कल्याण हेतु वृक्ष की भांति और चट्टान की तरह अडिग खड़ा रहता है।

ऋषि पंचमी परिचय
व्रत विधान
ऋषि पंचमी मंत्र
ऋषि पंचमी कथा
व्रत फल
ऋषि पंचमी

सत्यनिष्ठ ऋषि कष्टमय जीवन जी कर भी समाज, राष्ट्र और मानवता के हित में अपना सर्वस्व न्यौछावर करत देते हैं। ये समाज को नई राह दिखाते हैं और जनकल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं

ऋषि वर्तमान ही नहीं अपितु भावी पीढ़ियों के लिए भी पुण्य कार्य कर अपनी स्मृतियाँ छोड़ जाते हैं। ज्ञान के दीपक प्रज्वलित करने वाले ऋषि गण आदि काल से संसार विभिन्न देशों, धर्मों, जातियों और समुदायों में जन्म लेते आए हैं। कर्तव्य निष्ठा और कर्मपथ पर अडिग होकर मानवता को रौशनी दिखाकर काल पर विजय पाकर ये ऋषि अमर हो गए।

मानव जीवन को समुन्नत करने और मानवता के कल्याणार्थ निरंतर कार्य करने वाले महान ऋषियों के सम्मान करने के लिए ऋषि पंचमी महोत्सव मनाते हैं।

व्रत विधान

  • इस दिन व्रती प्रातःकाल से दोपहर तक उपवास रखकर, दोपहर में किसी नदी-तालाब के पास जाते हैं। नदी-तालाब के निकट अपामार्ग के दातुन से मुख साफ करके, शरीर पर मिट्टी या साबुन लगाकर स्नान करते हैं। फिर पंचगव्य का पान करते हैं।
  • फिर घर लौटकर गोबर से पूजास्थल को चौकोर लीपते हैं। विभिन्न शुभ रंगों से सर्वतोभद्र मंडल बनाकर उसपर मिट्टी या तांबे का कलश स्थापित करें।
  • उसे सुंदर वस्त्र से सजाकर उसके ऊपर मिट्टी या तांबे के कलश में जौ भरकर रखें। पंचरत्न, फूल, अक्षत,  धूप, गंधादि से पूजा करें।
  • कलश के पास अष्ट दल कमल बनाकर उसके दलों में अत्रि, कश्यप, गौतम, भरद्वाज, वसिष्ठ, जमदग्नि और विश्वामित्र- इन सप्तर्षियों और ऋषि वशिष्ठ भार्या देवी अरूंधती की प्रतिष्ठा की जाती है।
  • सप्तर्षियों और देवी अरूंधती का षोड्षोपचार कर पूजन करें।
  • इस दिन व्रती दही और साठी का चावल खाते हैं। हल से जोते अन्न और नमक का सेवन इस दिन वर्जित होता है। दिन में एक बार ही भोजन का प्रावधान है।
  • कलश आदि पूजन सामाग्री पूजन के उपरांत ब्राह्मण को दान कर दें और दरिद्र नारायण भोज कराएं और स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें।

ऋषि पंचमी पर मंत्र

कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोय गौतमः।

जमदग्निश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः।

गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं तुष्टा भवत मे सदा।।

ऋषि पंचमी पर पूजा के दौरान इस मंत्र का उच्चारण कर सप्तर्षियों स्मरण कर नमन करें।  इस व्रत के दिन जितना हो सके उतना भगवान का स्मरण करना चाहिए। 

ऋषि पंचमी कथा

सतयुग में श्येनजीत नामक एक राजा राज्य करता था। उसके राज्य में सुमित्र नामक एक ब्राह्मण रहता था जो वेदों का विद्वान था। सुमित्र खेती द्वारा अपने परिवार का भरण पोषण करता था। उसकी पत्नी जयश्री बड़ी सती साध्वी और पतिव्रता नारी थी। वह खेती किसानी उसमें भी अपने पति का सहयोग करती थी।

एक बार रजस्वला अवस्था में अनजाने में उसने घर का सब कार्य किया और पति का भी स्पर्श कर लिया। दैवयोग से पति-पत्नी की मृत्यु भी एक साथ हुई।

रजस्वला अवस्था में स्पर्श-अस्पर्श का विचार ना करने के कारण पत्नी का जन्म कुतिया और पति को बैल योनि प्राप्त। परंतु पूर्व जन्म में अनेक धार्मिक कर्म करने के कारण उन दोनों के ज्ञान बने रहे। संयोग से इस जन्म में भी वे साथ साथ अपने घर में पुत्र और पुत्रवधू के साथ रह रहे थे। पुत्र का नाम सुमति था, जो पिता की भांति वेदों का विद्वान था।

पितृपक्ष में अपने माता- पिता का श्राद्ध करने के लिए सुमति ने पत्नी को खीर कहकर बनवाया और पंडित जनों को निमंत्रण दिया। एक सांप ने आकर उस खीर को विषाक्त कर दिया। कुतिया बनी जयश्री यह सब देख रही थी। उसने सोचा यदि यह खीर ब्राह्मण जन खाएंगे तो विष के प्रभाव से मर जाएंगे और  सुमति को पाप लगेगा। ऐसा विचार करते उसने सुमति की पत्नी के सामने ही जाकर खीर को जूठा ककर दिया। इस पर सुमति की पत्नी बहुत क्रोधित हुई और चूहे से जलती लकड़ी निकाल कर उसकी पिटाई कर दी। उस दिन उसने कुछ भी खाने को भी नहीं दिया।

रात्रि में कुतिया ने बैल से सारी घटना बताई। बैल ने कहा, मुझे भी कुछ खाने को नहीं दिया गया। जबकि मुझसे दिन भर काम भी लिया गया। सुमति हम दोनों के ही मुक्ति के उद्देश्य से। श्राद्ध कर रहा है और हमें ही भूखों मार रहा है। इस तरह हम दोनों के भूखे रह जाने से तो इसका श्राद्ध करना व्यर्थ ही हुआ।

सुमति द्वार पर लेटा कुत्तिया और बैल की वार्ता सुन रहा था। संयोगवश वह पशुओं की बोली को समझता था। यह जानकर वह अत्यंत दुखी हुआ कि मेरे माता-पिता इस निकृष्ट योनि में पड़े हैं। वह दौड़ता हुआ एक ऋषि के आश्रम में गया और अपने माता-पिता के पशु योनि में पड़ने का कारण पूछा और मुक्ति का उपाय पूछा। ऋषि ने ध्यान और योग बल से सारा वृतांत जान लिया।

उन्होंने सुमति से कहा कि- तुम पति-पत्नी भाद्रपद शुक्ल पंचमी को ऋषि पंचमी का व्रत करो और उस दिन बैल के जोतने से उत्पन्न कोई भी अन्न न खाओ। ऋषि पंचमी व्रत के प्रभाव से तुम्हारे माता-पिता की मुक्ति हो जाएगी। मातृ-पितृ भक्त सुमति ने में ऋषि पंचमी का व्रत किया, जिसके प्रभाव से उसके माता-पिता को पशु योनि से मुक्ति मिल गई।

ऋषिपंचमी व्रत फल

यह व्रत शरीर के द्वारा जाने-अनजाने में पापों के प्रायश्चित के रूप में किया जाता है। इस व्रत से स्त्रियों को रजस्वला अवस्था में स्पर्श-अस्पर्श का विचार करने की शिक्षा लेनी चाहिए। साथ ही पुरुषों को भी इन दिनों संयम पूर्वक रहना चाहिए।

ये व्रत महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्यवती व्रत माना जाता है। इस व्रत को रखने से स्त्रियों से रजस्वला अवस्था में हुए दोष से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि अगर स्त्रियाँ ऋषि पंचमी के व्रत के दौरान गंगा स्नान करे, तो उनका फल कई गुना बढ़ जाता है। ऋषि पंचमी के व्रत को पूरी श्रद्धानुसार करने से जीवन के सभी दुख दूर हो जाते हैं। इस दिन विधि पूर्वक व्रत  करने और ऋषियों की पूजा-अर्चना से विशेष फल मिलता है।

ऋषि पंचमी का महत्व, व्रत विधि, मंत्र और कथा, फल

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