रक्षा बंधन की धार्मिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पूजन विधि

भाई-बहन के प्यार, स्नेह और पवित्र रिश्ते का पावन पर्व रक्षाबंधन श्रावण मास (जुलाई-अगस्‍त) के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व के हिंदू धर्मावलंबी हर्षोल्लास से इस पावन पर्व को मनाते हैं।

इस दिन बहनें ईश्वर से अपने भाई की कलाई में मंगल कामना (दीर्घायु, सुख-समृद्धि आदि) करते हुए राखी या रक्षा सूत्र बांधती है। भाई अपनी रक्षा सूत्र बांधने पर बहनों वचन देतें हैं की, वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करेंगे, हर विपत्ति-बाधा से बहन की रक्षा करेंगे। साथ ही बहनों को प्रिय उपहार भी देते हैं। धार्मिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से रक्षाबंधन बंधन का त्यौहार अत्यंत महत्वपूर्ण है।

रक्षाबंधन के बारे में
श्री कृष्ण और द्रौपदी रक्षाबंधन कथा
इंद्र और इंद्राणी से संबंधित रक्षा बंधन की पौराणिक कथा
रक्षाबंधन और हुमायूं और कर्णावती की कहानी
राखी बांधने की विधि
रक्षाबंधन विषय सूची

रक्षाबंधन की धार्मिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

श्री कृष्ण और द्रौपदी रक्षाबंधन कथा

रक्षा बंधन का इतिहास बहुत ही प्राचीन है। हिंदू पुराण कथाओं के अनुसार, द्वापर युग (महाभारत काल) में युधिष्ठिर के राज्याभिषेक (खांडवप्रस्थ) के दौरान भगवान श्री कृष्ण की अंगुली चोटिल हो गई (शिशुपाल की अभद्रतापूर्ण व्यवहार पर जब श्री कृष्ण ने क्रोध में आकर सुदर्शन चक्र और शिशुपाल का वध किया)। द्रौपदी भगवान कृष्‍ण की अंगुली से बहते रुधिर देखकर विचलित हो गई और रक्त धारा रोकने हेतु अपनी आंचल का किनारा फाड़कर श्री कृष्ण के कलाई पर बांध दिया। भावविह्वल होकर नर रूपी नारायण श्री कृष्‍ण ने द्रौपदी जिसे वे बहन मानते थे, द्रौपदी को रक्षा करने का वचन दिये।  

द्रौपदी के आंचल के धागे रूपी राखी और उसको दिये पवित्र वचन का निर्वाह प्रभु श्री कृष्ण ने आजीवन किया। कभी द्रौपदी चीरहरण में उसके चीर (वस्त्र) बढ़ा कर, तो कभी ऋषि दुर्वासा के क्रोध से पांडवों और द्रौपदी की रक्षा करके और महाभारत युद्ध में पांडवों (द्रौपदी के पतियों) की भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महारथियों से रक्षा कर पांडवों की जीत दिलाकर किया।

इंद्र और इंद्राणी से संबंधित रक्षा बंधन की पौराणिक कथा

भविष्योत्तरपुराण अनुसार एक बार देवताओं और दानवों के बीच बारह वर्षों तक संग्राम हुआ, किंतु देवताओं को विजय नहीं मिली। देव गुरु वृहस्पति ने युद्ध विराम का सुझाव दिया। यह सुनकर इंद्र की पत्नी शची (इंद्राणी) ने कहा, मैं कल इंद्र को रक्षा सूत्र बांधूंगी, इसके प्रभाव से इनकी रक्षा होगी और विजय श्री की प्राप्ति होगी। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को शची ने इंद्र को रक्षा सूत्र इंद्र को बांधा और देवताओं को विजय प्राप्ति  हुई।

रक्षाबंधन और हुमायूं और कर्णावती की कहानी

रक्षा अर्थात् बचाव, मध्‍यकालीन भारत में जहां कुछ स्‍थानों पर, महिलाएं असुरक्षित महसूस करती थी, वे पुरूषों को अपना भाई मानते हुए उनकी कलाई पर राखी बांधती थी।

मध्यकालीन युग में पति के मृत्योपरान्त चितौड़ पर वहां के दिवंगत राजा राणा सांगा की विधवा रानी कर्णावती के कंधों पर राज्य का भार आ गया वो राजगद्दी पर आसीन हो तो गई । किंतु सुल्तान बहादुर शाह (गुजरात प्रांत का राजा) की बुरी नजर कर्णावती के राज्य चितौड़ पर थी। वह मेवाड़ पर अपना आधिपत्य चाहता था। मौका देखकर सुल्तान बहादुर शाह ने चितौड़ पर हमला कर दिया । कर्णावती के पास साहस और वीरता का बल तो था ,किंतु चितौड़ की सैन्य शक्ति कम थी।  अतः चितौड़ की रक्षा हेतु  रानी कर्णावती ने अपने मुंहबोले भाई हुमायूं को  राखी  के साथ पत्र भेजा और मदद मांगी। हुमायूं ने भी बहन कर्णावती को रक्षा के लिए आश्वस्त किया। अपनी राखी बहन  के राज्य की बहादुर शाह से  रक्षा की और  अपने वचन को निभाया।

पत्र पाते ही हुमायूं  चितौड़ के रक्षार्थ विशाल सेना सहित चितौड़ की ओर कूच कर गया। किंतु जब तक हुमायूं सेना सहित चितौड़ पहुंचा, तब तक देर हो गई थी , रानी कर्णावती और चितौड़ की वीरांगना सती महिलाओं ने जौहर कर लिया। कर्णावती के जौहर के उपरांत चितौड़ पर बहादुर शाह का आधिपत्य हो गया। हुमायूँ को यह खबर विचलित कर गई और भावुक हो गया। उसने अपनी विशाल बल से सेना सहित चितौड़ पर आक्रमण दिया और जीत हुमायूं की हुई। विजयोपरांत हुमायूं ने बहादुर शाह को चितौड़ से खदेड़ दिया और संपूर्ण साम्राज्य की बागडोर रानी कर्णावती के पुत्र विक्रमजीत सिंह को दे दिया। तब से भाई -बहन के इस पवित्र रिश्ते की मिसाल दी जाती है।

राखी बांधने की विधि

रक्षाबंधन बंधन श्रावण शुक्ल पक्ष पूर्णिमा (पराह्णवयापिनी तिथि ली जाती है) को होता है। प्रातःकाल स्नानादि करके रक्षाबंधन और ऋषि पूजन करें। एक थाल में रंगीन रेशम या अन्य धागे का बना रक्षासूत्र लें, फिर थाल को केसर, पान, फूल, चंदन, अक्षत, रोली, दूर्वा और लड्डू से सजाएं। घर के शुद्ध स्थान पर पूर्वाभिमुख होकर भाई को केसर, रोली अक्षत का तिलक करें,  भाई की नजर उतारे,  मंगल गीत गाएं, रक्षा सूत्र बांध कर मिष्ठान खिलाएं और वर्ष पर्यंत भाई  पुत्र-पौत्रादि सुखी संपन्न रहे ऐसी कामना करें। निम्नलिखित मंत्रोच्चारण करते हुए दाहिने हाथ में रक्षाबंधन बांधेंः

“येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।“

रक्षाबंधन आयु-आरोग्य वृद्धि के लिए बांधा जाता है। रक्षा बंधन का पावन पर्व भाई-बहन के भावनात्मक संबंध को प्रगाढ़ करता है। श्री कृष्ण जी गीता में कहते हैं कि,

 “ मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव”

अर्थात ‘सूत्र या धागा’ अविभाज्यता का प्रतीक होता है। धागे बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एकीकृत कर माला का रूप देती है। यह माला जुड़ाव,मजबूती, प्रगाढ़ता और अविच्छिन्नता का प्रतीक होता है। यह नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मकता ओर जाने का त्यौहार है।

रक्षाबंधन सिर्फ भाई बहन तक सीमित पर्व नहीं है। इस दिन भक्तजन अपने इष्टदेव को भी रक्षासूत्र या राखी समर्पित करते हैं।

भक्तजन अपने आराध्य को भी राखी समर्पित करते है। हमारे सैनिक जो परिवार से दूर मातृभूमि भूमि की रक्षा कर रहे हैं उन्हें भी हमें राखी भेंट करना चाहिए। हमारे शिक्षक, वैज्ञानिक या सामाजिक कार्यकर्ता जो ज्ञान का दीप जलाकर समाज के अंधकार को मिटा रहें हैं उन्हें भी राखी बांधकर सम्मानित करें। खिलाड़ी जो दिन-रात मेहनत करके अंतरराष्ट्रीय मंच पर राष्ट्र का गौरव बढ़ाते हैं, उनका भी राखी बांध कर मान बढ़ाएं।

सनातन धर्म की यह परंपरा बहुत ही वृहद मायने रखते हैं। एक स्वस्थ और प्रगतिशील समाज की स्थापना हेतु समाज के सभी वर्गों को हमारी परंपरा जोड़ती है। रक्षाबंधन पर गर हर भारतीय प्रण ले की धर्म, जाति, ऊंच-नीच, भाषा, क्षेत्रवाद से परे हम भारतीय बने और भारत को विश्व गुरु बनने का मार्ग प्रशस्त करें।

जय हिंद

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