श्री कृष्ण भगवान की बहन और यदुवंशियों की कुलदेवी कैलादेवी के चमत्कारी मंदिर का रहस्य

कैलादेवी मंदिर, करौली

यादवों का तीर्थ स्थल के बारे में

यदुवंशियों (हिन्दू) की कुलदेवी माता कैलादेवी का विश्व प्रसिद्ध चमत्कारी मंदिर राजस्थान के करौली जिले से करीब 24 किमी दूर, त्रिकूट पर्वत पर, कैला ग्राम में है। इसकी शक्तिपीठ की ख्याति भारतवर्ष में सर्वत्र है। कैला देवी मंदिर देवी भक्तों के लिए अति पूजनीय स्थल है। मां कैलादेवी आदिशक्ति महायोगिनी महामाया की अवतार हैं, जिनका जन्म गोकुल में नंदराय जी और यशोदा मैया के घर हुआ था।

त्रिकूट पर्वत की पहाड़ियों के बीच कालीसील नदी के तट पर माता कैला देवी का दरबार है। राजस्थान की ऐतिहासिक धरती पर स्थित इस प्राचीन मंदिर का इतिहास अद्भुत है। अष्ट भुजाओं वाली माता कैलादेवी सिंह की सवारी करती हैं। मां अपने हर भक्त की हर मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।

भारत में माता कैलादेवी के दो मंदिर है। एक करौली (राजस्थान) और दूसरा मंदिर संभल (भूड़, उत्तर प्रदेश) में। सोमवार को माता के दर्शन का विशेष महत्व है और सोमवार को माता के दर्शन हेतु वर्ष भर भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि यहाँ नवरात्र में शेर के देवी दर्शन को आते हैं।

  • यादवों का तीर्थ स्थल के बारे में
  • मंदिर का प्रांगण और इतिहास
  • क्यों यदुवंशी माता कैलादेवी को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं?
  • क्यों आस्था का प्रतीक है कैलादेवी मंदिर?
  • कैलादेवी मेला (लक्खी मेला)
  • कैलादेवी से संबंधित लोककथाएँ
  • क्यों तिरछा है माता का चेहरा?
  • क्यों डाकू आते हैं यहां मां का आशीर्वाद लेने ?

मंदिर का प्रांगण और इतिहास

  • संगमरमर के बने माता के मंदिर (मुख्य मंदिर) में मां कैलादेवीके साथ मां चामुण्डा की भी प्रतिमा है। मंदिर के प्रांगण में भगवान शिव, भैरों बाबा, भगवान गणेश और हनुमानजी का मंदिर अवस्थित है।
  • चामुण्डा देवी की प्रतिमा महाराजा गोपाल सिंह द्वारा स्थापित की गई थी।
  • माता के मंदिर के सामने हनुमान जी का भी मंदिर है, हनुमानजी को लांगुरिया के नाम से पूजते है। यहां के लोग भैरव बाबा, लांगुरिया अर्थात हनुमानजी और मां कैला देवी की प्रसन्न करने हेतु लोकगीत भजन गाते हैं और ये भजन-गीत भक्तों के भक्ति, श्रद्धा और अगाध प्रेम प्रदर्शन का माध्यम है।
  • मंदिर के पास एक विशाल जल कुंड है जिसे अर्जुन पाल जी ने बनवाया था। यह जल कुंड पुराने जमाने में मनुष्य निर्मित विशालतम जल का स्रोत हुआ करता था।
  • 1723 में महाराजा गोपाल सिंह ने मंदिर को बड़ा और विशाल बनाने में अहम भूमिका निभाई।
  • महाराजा भंवरपाल (1886), को मंदिर का नवनिर्माण कराया, आधुनिक स्थापत्य कला से सौंदर्यीकरण कराया और तीर्थयात्रियों के लिए कुएँ धर्मशाला व्यवस्था कराई।
  • इसी तरह महाराजा भौमपाल और गणेश पाल ने भी मंदिर में बिजली, पानी, बाह्य एवं आंतरिक सौंदर्यीकरण कराने का काम किया।

क्यों यदुवंशी माता कैलादेवी को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं?

क्या है इनका भगवान कृष्ण और यदुवंश से संबंध?

आततायी कंस ने कारागार में भगवान श्री कृष्ण के माता-पिता वसुदेव जी और देवकी माता के सात संतानों का क्रूरता से वध इस आशंका से कर दिया की देवकी की आठवीं संतान उसकी मृत्यु का कारण बनेंगा।

मां देवकी-वसुदेव जी के आठवीं संतान के रूप में श्री कृष्णजी का जब जन्म हुआ, उसी समय गोकुल में नंद बाबा-यशोदा मैया के घर एक कन्या का जन्म हुआ था। वसुदेवजी गोकुल जाकर कान्हा को वहां छोड़ आए और नंद बाबा की नवजात कन्या (योगमाया) को अपने साथ मथुरा ले आए।

कंस को जैसे ही सूचना मिली देवकी ने आठवीं संतान के रूप में पुत्री को जन्म दिया है। कंस उस कन्या का वध करने कारागार में आ धमका। जैसे ही कंस ने कन्या को दीवार पर पटका, वह अंतर्ध्यान हो गई। नंदबाबा-यशोदा मां की वह कन्या कोई साधारण कन्या नहीं बल्कि स्वयं देवी योगमाया थीं।

देवी ने अट्टहास किया और कंस को कहा मूर्ख तुम्हारा अंत करने वाला धरती पर आ चुका है। इसके बाद देवी विंध्य पर्वत पर विंध्यवासिनी देवी के रूप में निवास करने लगीं। मान्यता यह भी है कि समस्त जगत के लिए पूजनीय वही कन्या श्री कृष्ण जी की बहन देवी योगमाया कैलादेवी या करौली मैया स्वरूप में करौली, राजस्थान मंदिर में विद्यमान हैं। इसीलिए मां कैला देवी को समस्त यदुवंशी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।

स्कंद पुराण के 65 वें अध्याय में यह वर्णित भी है कि, कलयुग में देवी महायोगिनी योगमाया को कैलादेवी या कैलेश्वरी देवी के रूप में पूजा जाएगा।

क्यों आस्था का प्रतीक है कैलादेवी मंदिर?

  • मान्यताओं के अनुसार मंदिर से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा जो भी सच्चे मन से जो भी मन्नत लेकर आता है उसकी मनोकामना जरुर पूरी होती है।
  • करौली के यदुवंशी राजाओं का माता कैलादेवी से गहरा जुड़ाव देखा गया। क्योंकि मां कैलादेवी के आशीर्वाद से पीढ़ियों तक यदुवंशी राजाओं ने राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक दृष्टि से बहुत उन्नति की और फले-फूले।
  • निसंतान दंपती की मां गोद भरती हैं, सुहागिन स्त्रियों को सौभाग्य प्रदान करती हैं। कुंवारी कन्याओं को माता के दर्शन मात्र से सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है। हर भक्त पर मां अपनी कृपा बरसाती हैं।
  • ऐसी मान्यता है कि माँ कैलादेवी सर्वमनोकामना सिद्धि दायिनी हैं, मां के द्वार से कोई खाली हाथ नहीं जाता, श्रद्धालु जो भी मन्नत मांगते हैं माँ उसको अवश्य पूरा करती हैं।

कैलादेवी मेला (लक्खी मेला)

  • करौली में प्रतिवर्ष कैलादेवी का बहुत प्रसिद्ध वार्षिक मेला (लक्खी मेला) चैत्रमास (मार्च-अप्रैल) में बहुत बड़े तौर पर आयोजित होता है। देश के विभिन्न प्रांतों (यूपी, मप्र, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात, राजस्थान आदि) से लोगों का जनसैलाब इस मेले में उमड़ता है।
  • श्रद्धालु चैत्र मास की तपती गर्मी में सैंकड़ों किलोमीटर की पद यात्रा और कड़क दंडवत करते हुए देवी मां के दर्शन हेतु आते हैं। फिर भक्त कालीसिल नदी में स्‍नान करते हैं। स्‍नान के उपरांत भक्‍त कैला देवी के दर्शन के लिए जाते हैं। वैसे तो वर्षभर भक्तों का तांता देवी के द्वार पर लगा रहता है, किंतु नवरात्र के दिनों में भक्तों की भारी भीड़ देखते ही बनती है।
  • 17 दिवसीय मेले में लाखों की संख्या में अलग-अलग प्रांतों से यात्री ध्वज लेकर लांगुरिया गीत गाते हुए आते है। अनुमानतः प्रतिवर्ष लगभग 30 से 40 लाख यात्री मां के दरबार में अपनी हाजिरी लगाते है।
  • महिलाएं मेले से सुहाग के सामान चूडिय़ां, कुमकुम और सिंन्दूर खरीद माता को अर्पित करती हैं। बच्चों का मुंडन संस्कार की कराने दूर-दूर से लोग आते हैं। नवदंपति भी विवाह के बाद सौहार्दपूर्ण वैवाहिक जीवन की शुरुआत करने के लिए माता का आशीर्वाद लेने यहाँ आते थे। माता को प्रसन्न करने हेतु भक्त ढोल-नगाडों की धुन पर लांगुरिया गीत गाते हैं और झूमते हैं।
  • यह मंदिर डकैतों के लिए भी आस्था का मंदिर है।
  • मंदिर में लोग अपने बच्चों का पहली बार मुंडन करवाने हेतु पहुंचते है।
  • यहाँ लोगों की एक मान्यता यह भी है कि परिवार में किसी का विवाह होने के बाद नवविवाहित जोड़ा जब तक आकर कैला देवी के दर्शन नहीं कर लेता तब तक परिवार का कोई भी सदस्य यहां दर्शन करने के लिये नहीं आता है। 

कैलादेवी से संबंधित लोककथाएँ

त्रिकूट मंदिर की मनोरम पहाड़ियों में स्थित इस मंदिर का निर्माण राजा भोमपाल ने 1600 ई. में करवाया था। करौली जिला ऐतिहासिक रूप से यादवों के प्राचीन राज्य था, सांस्कृतिक रूप से ब्रज मण्डल का तथा राजनीतिक रूप से राजस्थान का अंग है। कालीसिल, भद्रावती, मांची, गंभीर तथा चम्बल आदि कई नदियों से निकटता इस भूभाग की हरियाली की मुख्य वजह है, किंतु पर्वत श्रृंखलाओं (अरावली पर्वतमाला) की मौजूदगी के कारण यह क्षेत्र राजस्थान के अन्य मैदानी भागों की अपेक्षा कम विकसित हुआ। इस मंदिर से जुड़ी अनेक कथाएं यहाँ प्रचलित है।

कथा 1

शास्त्रानुसार माता सती के अंग जहां-जहां गिरे वहां शक्ति पीठ का बने। उन्हीं शक्ति पीठों में से एक है माता कैलादेवी मंदिर। मान्यता है, 11 वीं शताब्दी में बाबा केदागिरी ने तपस्या के बाद माता के श्रीमुख की स्थापना इस शक्तिपीठ के रूप में की। प्राचीन काल में कालीसिल नदी के तट पर केदागिरी बाबा तपस्या किए करते थे, यहां के घने जंगल में स्थित पहाड़ों-कन्दराओं में एक दानव रहता था। वह दानव संयासीजनों एवं ग्रामवासीयों को परेशान करता था। बाबा ने इन दैत्यों से को मुक्ति हेतु घोर तपस्या की, तप से प्रसन्न होकर माता प्रकट हुई। बाबा ने देवी मां से दैत्यों संहार करने की याचना की, मां ने उसकी याचना स्वीकार की और अंतर्ध्यान हो गई। बाबा केदारगिरी त्रिकूट पर्वत पर लौट आए। कुछ समय बाद देवी मां कैला ग्राम में प्रकट हुई और उन्होंने दानव का कालीसिन्ध नदी के तट पर संहार किया। आज भी एक विशाल चट्टान दानव के पैरों के निशान मौजूद है। इस स्थान को दानवदह नाम से जाना जाता है।

कथा 2

लोककथाओं के अनुसार त्रिकूट पर्वत पर चरवाहे मवेशियों को चराने जाते थे, उनमें बहूरा नाम के चरवाहे ने ध्यान दिया कि प्रतिदिन एक विशेष स्थान पर गौ-बकरियों का दूग्ध स्राव अप्रत्याशित तौर पर बढ़ जाता है, वह विस्मित हो गया। उसने उस जगह की खुदाई की तो उसे देवी मां कैलादेवी की प्रतिमा मिली। चरवाहे बहूरा प्रेम, भक्ति, आस्था से आह्लादित हो गया। वह माता की प्रतिमा को वहीं स्थापित कर भक्ति भाव पूजा-अर्चना करने लगा। माता की मूर्ति प्रकट होने की बात जंगल में आग की तरह फैली। दूर-दूर से दर्शनाभिलाषी मां के आशीर्वाद लेने आने लगे। आज भी मंदिर स्थापित करने वाले मां के अनन्य भक्त बहूरा की मूर्ति मंदिर प्रांगण में है।

कथा 3

प्राचीन काल में त्रिकूट पर्वत घने जंगल से घिरा था। नरकासुर नामक दुष्ट राक्षस यहाँ निवास करता था। नरकासुर के आतंक से आसपास के ग्रामीण, ऋषि-मुनि त्रस्त थे। उसके अत्याचारों से आतंकित जनता त्राहि- त्राहि कर रही थी। परेशान हो ग्रामवासियों ने रक्षा हेतु मां दुर्गा का आह्वान किया। फलतः मां दुर्गा का आह्वान किया और उनसे रक्षा करने की प्रार्थना की। लोगों के रक्षार्थ और शरणार्गत के दुःख निवारण हेतु माँ कैला देवी अवतरित होकर नरकासुर का संहार किया और अपने भक्तों की रक्षा की। इसके बाद से वहां महामाया कैलादेवी की पूजा भक्तगण करते आ रहे हैं।

कथा 4

ऐसी मान्यता है कि मंदिर में स्थापित मूर्ति पहले में नगरकोट में थी। मुगल काल में मुगल शासकों द्वारा संचालित मूर्ति विध्वंस अभियान जोर पर था। इसी भय से मंदिर के पुजारी योगिराज मूर्ति को मुकुंददास खींची के पास रखने को निकले। रात हो जाने के कारण योगिराज ने केदार गिरि बाबा की गुफा समीप मूर्ति बैलगाड़ी से उतारकर नीचे रख दी और बाबा से मिलने चले गए। प्रातःकाल जब योगिराज ने मूर्ति उठाने की कोशिश की तो वह उस मूर्ति हिला भी नहीं पाए। इसे देवी मां की इच्छा समझ योगिराज और बाबा केदारगिरी ने मूर्ति की उसी स्थान पर विधिवत पूजा-अर्चना प्रारंभ की।

क्यों तिरछा है माता का चेहरा?

माता की मू्र्ति के तिरछे चेहरे के बारे में किंवदंती है कि माता कैला देवी का एक अनन्य भक्त दर्शन उपरांत यह कहकर मंदिर से बाहर गया कि वह जल्दी ही लौटकर फिर वापस आएगा। किंतु वह आज तक नहीं आया है। मान्यता है कि माता आज भी भक्त की राह में आज भी उधर की ही ओर देख रहीं है जिधर से वह गया था।

क्यों डाकू आते हैं यहां मां का आशीर्वाद लेने ?

किसी जमाने में यहाँ  बीहड़ था और बीहड़ों में कुख्यात डाकुओं का खौफ था। डकैतों में प्रथा थी कि वो कहीं भी डकैती पर जाने से पहले और डकैती के बाद मां की पूजा करते और आशीर्वाद लेने आते थें। आज भी यहां कई डकैत माता का आशीर्वाद लेने निहत्थे, बेखौफ आतें हैं, किंतु कभी भी  डकैतों ने यहाँ आए भक्तों को हानि नहीं किया।

मां कैलादेवी की महिमा अपरंपार है। शब्दों में माता की महिमा समेटना कठिन है। जो भी सच्चे मन से मां से फरियाद करता है, उसकी हर मनोकामना जरूर पूरी।करती हैंं।

जय करौली मां

जय हिंद

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