क्यों मनाते हैं शीतलाष्टमी अष्टमी? क्या महत्व है शीतलाष्टमी का?

प्राचीन काल से हिन्दू धर्मावलंबी परम पूज्य देवी शीतला माता की आराधना करते आ रहे हैं। पुराणों में भी माता के महात्म्य का उल्लेख है। शीतला माता हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) और नीम के पत्ते धारण करती हैं। गर्दभ माता का वाहन है (स्कंदपुराण अनुसार)।

होली के आठवें दिन शीतला माता को समर्पित शीतलाष्टमी मनाई जाती है। इस दिन शीतला माता की सच्चे मन से आराधना करने से माता संक्रामक रोगों जैसे चेचक, खसरा, हैजा  से रक्षा करती हैं। इस दिन माता को बासी पकवान चढ़ाने की प्रथा हैl

  • परिचय
  • मंत्र
  • कथा
  • महत्व
  • पूजन विधि

भारत के अलग-अलग प्रांत में अलग-अलग तिथि पर शीतला माता की पूजा होती है। किन्तु चैत्र मास, कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी पर्व मनाया जाता है। ये होली के अगले सप्ताह में बाद में करते हैं।

‘शीतलाष्टमी या बसोड़ा’ को बासी भोजन का प्रावधान होता है। इस दिन घर में ताजा भोजन नहीं बनाया जाता। एक दिन पूर्व ही भोजन बनाकर रखा जाता है, फिर दूसरे दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर शीतला माता का पूजन करने के पश्चात घर के सभी सदस्य बासी भोजन को ग्रहण करते हैं। जिस घर में चेचक कोई बीमार हो, उसे यह व्रत नहीं करना चाहिए। इस पर्व को ‘बसौड़ा’, ‘बासौड़ा’, ‘लसौड़ा’ या ‘बसियौरा’ भी कहा जाता है।

शीतला माता की पूजा विशेष तरीक़े से की जाती है। शीतला अष्टमी के एक दिन पहले माता को भोग लगाने के लिए बासी खाने का प्रसाद या बसौड़ा तैयार किया  जाता है। अष्टमी को बासी प्रसाद देवी समर्पित किया जाता है और भक्तों को प्रसाद दिया जाता है। इसीलए शीतलाष्टमी बसौड़ा के नाम से विख्यात है।

शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए यह मंत्र है:

वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।

अर्थात् मैं उस शीतला देवी की वंदना करता हूँ, जो गर्दभ पर विराजमान हैं, दिगम्बरा है, हाथ में जिनके झाडू है तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तक वाली हैं।

शीतला माता के इस वंदना मंत्र माता के शीतलता, शुद्धता और स्वच्छता की अधिष्ठात्री रूप का परिचायक हैं। हाथ में मार्जनी झाडू भक्तजनों को स्वच्छता के  प्रति जागृत करता है कलश स्वच्छता एवं स्वास्थ्य, समृद्धि के अमृत पान का परिचायक है।

शीतला माता की आराधना से चेचक और चर्म रोगों से पीड़ितों रोगी लाभ पाता है। माता के रुप का प्रतीकात्मक महत्व है। चेचक (Chiken pox) रोगी व्यग्रता और खारिश से वस्त्र उतार देता है। सूप से रोगी को ठंडी हवा की जाती है, झाडू से चेचक के फोड़े फूट जाते हैं। नीम के पत्ते रोगी के बिस्तर के नीचे डालने से संक्रमण नहीं होता और चेचक से हुए फोड़े सूखने लगते है। कलश का ठंडा पानी रोगी के लिए अमृतमय होता है। गर्दभ की लीद लेपन से चेचक के दाग मिटते हैं।

स्कन्द पुराण में शीतला देवी की महात्म्य गान शीतलाष्टक से की गई है। मान्यता है, शीतलाष्टक की रचना स्वयं भगवान शंकर ने लोक कल्याण हेतु की थी। शीतलाष्टक पाठ करने वाले भक्तों पर सदैव मां शीतला की कृपा बरसती है।

शास्त्रों के अनुसार मान्यता है कि शीतला माता पूजा-अर्चना व्रत करने से शीतला माता प्रसन्‍न होती हैं और भक्त और उसके परिवार में दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, फोडे, नेत्रों रोग, माता की फुंसियों के दाग और शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं। शीतला माता हर तरह के तापों का नाश करती हैं और अपने भक्तों के तन-मन को शीतल करती हैं।

लोककथा

क्यों माता शीतला को बासी प्रसाद का भोग लगाते हैं?

एक समय की बात है, एक गांव में ग्रामीणों ने शीतला माता की पूजा का आयोजन किया। भूलवश ग्रामीणों ने माँ को गर भोजन का प्रसाद अर्पण किया। नाम के सदृश माता शीतलता की प्रतिमूर्ति हैं और गर्म प्रसाद के चढ़ावे से माता कुपित हो उठी। माता की कोप के फलस्वरूप सारा गांव रोग कष्ट से जल उठा। किंतु एक बुढ़ी स्त्री माता की कोपभाजक नहीं बनी। ग्रामीणों ने उस बूढ़ी स्त्री से इसका कारण पूछा। बुढि़या ने बताया कि, तुम लोगों ने शीतलता की देवी शीतला मां को गर्म प्रसाद का भोग लगाया, जबकि मैंने रात को ही भोजन बनाकर माँ को बासी (ठंडा) भोग लगाया। फलतः तुमलोग माँ के कोपभाजक बनें और मुझ पर मां प्रसन्न होकर कृपा बरसायी। बुढ़िया की बात सुनकर ग्रामीणों को अपनी अज्ञानता और भूल का एहसास हुआ। ग्रामीणों ने माँ से क्षमा मांगी और रंग पंचमी के बाद आने वाली सप्तमी या अष्टमी को शीतलाष्टमी के दिन माता को बासी भोग लगाकर माँ का बसौड़ा पूजन किया।

महत्त्व

शास्त्रानुसार स्त्रियाँ अपने प्रियजनों पति और बच्चों के सुख-शांति-समृद्धि, आरोग्यता व दीर्घायु होने की कामनाओं के साथ ‘रंग पंचमी’ से शीतलाष्टमी तक माँ शीतला को बसौड़ा का भोग लगाकर पूजती हैं। बसौड़ा हलवा, पूड़ी, मीठे चावल, कढ़ी, दही, चने की दाल, नैवेद्य आदि एक दिन पहले ही बनाकर रख लिए जाते हैं। तत्पश्चात् सुबह घर व मंदिर में माता की पूजा-अर्चना कर महिलाएं शीतला माता को बसौड़ा का प्रसाद चढ़ाती हैं। पूजा करने के बाद घर की महिलाओं ने बसौड़ा का प्रसाद अपने परिवारों में बांट कर सभी के साथ मिलजुल कर बासी भोजन ग्रहण करके माता का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

शीतलाष्टमी से ग्रीष्मकाल शुरू हो जाता है, मौसम तेजी से गर्म होने लगता है। शीतलता की प्रतिमूर्ति शीतला माता ग्रीष्म जनित रोग से रक्षा करती हैं।  

पूजन विधि और महत्त्वपूर्ण बातें

  • इस व्रत में मिष्ठान, पूरी, खीर, मालपुए, दाल-चावल आदि एक दिन पहले से बनाए जाते हैं। व्रत के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाने का रिवाज है।
  • कुछ प्रांतों में गुड़ या गन्ने के रस से बने मीठे चावल के विशेष प्रकार के भोग चढ़ाने का प्रावधान है। प्रसाद सप्तमी रात्रि में बनाकर अष्टमी को भोग माता को अर्पित कर, कुटुम्ब जनों को वितरित किया जाता है।
  • घर की महिला सदस्य रोली, अक्षत घी में मिलाकर पांचों अंगुलियों पर लगाकर रसोई की दीवार पर छापा लगाती हैं।
  • इस दिन शीतलाष्टक और शीतला माता की कथा सुननी चाहिए।
  • व्रती को प्रात:काल शीतल जल से स्नान करके संकल्प करें।
  • देवी को भोग लगाने वाले सभी पदार्थ एक दिन पहले ही बनाये जाते हैं अर्थात शीतला माता को बासी भोजन का भोग लगाया जाता है।
  • दीप प्रज्वलित कर, थाल में रोली, अक्षत, हल्दी, शक्कर, अनाज (पके हुए चावल, रोटी, बाजरा, मोठ आदि), दही और जल  रोटी आदि सजाकर घर या मन्दिर में चढ़ाना चाहिए।
  • पूजन पश्चात बयाना निकाल कर उस पर इच्छानुसार दक्षिणा रखकर घर के बड़ों के चरण स्पर्श कर उन्हें देना चाहिए।
यह लेख आज का आलेख के लिए निर्वाचित हुआ है। अधिक जानकारी हेतु क्लिक करें।

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