षट्तिला एकादशी

माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षट्तिला एकादशी (Shattila Ekadashi) कहते हैं। पद्म और विष्णु पुराण के अनुसार माघ मास के एकादशी और द्वादशी को श्री हरी विष्णु जी का तिल से पूजा और व्रत का बहुत महत्व है।

माघ एकादशी को काले तिल से पूजन, स्नान, दान, हवन का विशेष महत्व है। पुराणों के अनुसार इस दिन विष्णु भगवान का तिल से पूजन से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। इस दिन उपासक जितने तिल दान करता है, वह उतने ही सहस्त्र वर्ष स्वर्ग में निवास करता है। इस व्रत को विधिवत करने वाला व्रती समस्त प्रकार के सुख-समृद्धि, आरोग्य और वैभव को पाता है। इस दिन उपासक छ: प्रकार से तिल प्रयोग कर पूजा विधि करता है, इसीलिए इसे “षटतिला एकादशी” के कहते हैं।

  1. तिल से स्नान
  2. तिल के नैवेद्य का भोग श्री हरि को
  3. तिल की उबटन का लेप
  4. तिल की आहुति हवन और तिल का तर्पण
  5. तिल का फलाहार के साथ सेवन
  6. तिल का दान

उपरोक्त छह विधि से पूजन का षटतिला एकादशी में प्रयोजन है।

पूजन विधि

षटतिला एकादशी के दिन ब्रह्म मूहूर्त में शरीर पर तिल के तेल की मालिश करें, नहाने के पानी में तिल डालकर स्नान करें, स्नानादि के बाद श्री हरि विष्णु के मूर्ति या फोटो का पूजन करें, तिल से बने नैवेद्य का भगवान को भोग लगाएं। चरणामृत में भी तिल मिश्रित कर प्रभु को स्नान करें। विष्णु सहस्रनाम के पाठ और कृष्ण भजन का भी करें। पूजा-अर्चना के बाद तिल का प्रसाद ग्रहण करेंं और तिल का दान करें क्योंकि शास्त्रानुसार दान के बिना कोई भी धार्मिक कार्य संपन्न नहीं होता।

क्या महत्व है व्रत और तिल के प्रयोग का?

एकादशी के व्रत से शारीरिक और मानसिक शुद्धि प्राप्त होती है। तिल का सेवन आरोग्यता देता है, तिल स्वास्थ्यवर्द्धक होता है। तिल का उबटन और तिल के तेल की मालिश सौन्दर्यवर्धक होता है। तिल दान करने से धन-सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।

षटतिला एकादशी की कथा

एक बार नारदमुनि भगवान विष्णु दर्शन हेतु वैकुण्ठ धाम गए। वहाँ उन्हें भगवान विष्णु ने उन्हें ‘षटतिला एकादशी’ की कथा तथा उसके महत्त्व के बारे मेंं बताया। कथा इस प्रकार है कि :

‘प्राचीन काल में एक धनी स्त्री थी। उसके पति की मृत्यु हो चुकी थी। वह श्री हरि की अनन्य भक्त थी। वह पूरे एक मास तक व्रत रखकर प्रभु की आराधना किया करती थी। व्रत से उसका शरीर शुद्ध हो गया, परंतु दान धर्म का वह कभी भी पालन नहींं करती थी। अतः विष्णु भगवान ने सोचा कि यह स्त्री मेरी अनन्य भक्ति के पश्चात वैकुण्ठ में रहकर भी अतृप्त रहेगी। अत: श्री हरि स्वयं एक दिन उसके पास याचक बन कर भिक्षा लेने गए।

जब प्रभु ने भिक्षा की याचना की, तब उस स्त्री ने एक मिट्टी पिण्ड याचक के हाथों में रख दिया। श्री हरि उस पिण्ड को लिए वैकुण्ठ लौट आए। कालांतर में वह देह त्याग कर वैकुण्ठ लोक में आ गई। वैकुण्ठ में उसे एक आम का पेड़ और कुटिया मिली। ख़ाली कुटिया को देख वह श्री हरि के चरणों में गिर कर विलाप करने लगी और बोली – “प्रभु मैंने आजीवन धर्मपरायण रहकर आपकी भक्ति की, फिर मुझे ख़ाली कुटिया क्यों मिली?” तब प्रभु ने उसे बताया कि ऐसा दान नहीं करने तथा याचक रूपी भगवान विष्णु को मिट्टी का पिण्ड देने से हुआ है।

फिर प्रभु ने भक्तन का मार्ग दर्शन किया। प्रभु ने देव कन्याओं को उस स्त्री की कुटिया में भेजा, उन देवकन्याओं ने स्त्री को ‘षटतिला एकादशी’ के व्रत का विधान महिला को बताया। स्त्री ने देवकन्याओं की बताई विधिनुसार ‘षटतिला एकादशी’ का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसकी कुटिया धन-धान्य से भर गई। व्रत के प्रभाव से उस स्त्री की सर्वमनोकामना पूर्ति हुई।

अतः हे नारद! जो व्यक्ति इस षटतिला एकादशी का व्रत करता है और तिल और धान्य दान करता है, उसे सुख, वैभव, आरोग्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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