धर्म – संस्कृति

नर्मदा जयंती, नर्मदा अष्टकम्, क्यों पूज्य है नर्मदा नदी

नर्मदा  का शाब्दिक अर्थ नर्म का अर्थ है- सुख और दा का अर्थ है- देने वाली अर्थात् सुखदायिनी, वरदायिनी। नर्मदा जयंती का पावन महोत्सव माता नर्मदा के जन्मोत्सव के रूप में सम्पूर्ण देश में मनाया जाता है। गंगा नदी के ही सदृश नर्मदा नदी को भी पूजा जाता है और धार्मिक दृष्टिकोण से भी नर्मदा नदी अति विशिष्ट है। शास्त्रानुसार नर्मदा नदी पापनाशिनी, सुख-समृद्धिदायिनी है।  महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक ओमकारेश्वर नर्मदा तीर पर स्थित है।

भक्ति और श्रद्धा से अक्षय पुण्यदायिनी मां नर्मदा के अर्चना करने से सर्वमनोकामना पूर्ण होती है। कहते हैं, गंगा नदी में स्नान से जो फल एक दिन में, सरस्वती नदी में स्नान से तीन दिन में मिलता है। स्वयं श्री हरि विष्णु ने नर्मदा को आशीर्वाद दिया हैः

नर्मदे त्वें माहभागा सर्व पापहरि भव,
त्वदत्सु याः शिलाः सर्वा शिव कल्पा भवन्तु ताः

अर्थात् नर्मदा तुम्हारे अंदर संसार के सभी पापों को हरने की क्षमता होगी। तुम्हारे जल से शिव का अभिषेक किया जायेगा। भगवान शिव ओमकारेश्वर के रूप में सदैव तुम्हारे तट पर विराजमान रहेंगें और उनकी कृपा तुम पर बन रहेगी। जिस प्रकार स्वर्ग से अवतरित होकर गंगा प्रसिद्द हुई थी उसी प्रकार तुम भी जानी जाओगी।

भारतीय संस्कृति मे नदी को माता की संज्ञा दी गई है। क्योंकि नदी मां की तरह जीवनदायिनी होती है। मध्यप्रदेश और गुजरात की यह मुख्य नदी है, यहाँ की आबादी इसी पर निर्भर है।

माघ मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को परम् पावनी माँ नर्मदा जी की जयंती होती है। इस वर्ष नर्मदा जयंती 19 फरवरी 2021 को मनायी जाएगी। इस दिन हजारों श्रद्धालु भक्त मां नर्मदा की परिक्रमा भी करते हैं। नर्मदा जयंती के दिन माँ नर्मदा के तीर पर नर्मदाष्टकम और नर्मदा चालीसा का पाठ करने से मनुष्य के जाने-अनजाने में हुए पाप कटते हैं और सर्वकामना पूर्ण होती है।

श्री नर्मदाष्टकम

सबिन्दु सिन्धु सुस्खल त्तरङ्ग भङ्ग रञ्जितं।

द्विषत्सु पाप जात-जात कारि वारि संयुतम्।।

कृतान्त दूत काल भूत भीति हारि वर्मदे।

त्वदीय पाद पङ्कजम् नमामि देवि नर्मदे॥1॥

त्वदम्बु लीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकम्।

कलौ मलौघ भारहारि सर्वतीर्थ नायकं।।

सुमच्छ कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक शर्मदे।

त्वदीय पाद पङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥2॥

महागभीर नीर पुर पापधूत भूतलं।

ध्वनत् समस्त पातकारि दारितापदाचलम्।

जगत् लये महाभये मृकण्डसूनु हर्म्यदे।

त्वदीय पाद पङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥3॥

गतं तदैव मे भवं त्वदम्बु वीक्षितम् यदा।

मृकण्डसूनु शौनक असुरारि सेवि सर्वदा।।

पुनर्भवाब्धि जन्मजं भवाब्धि दुःख वर्मदे।

त्वदीय पाद पङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥4॥

अलक्ष लक्ष किन्नरम नर सुर आदि पूजितं।

सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षि लक्ष कूजितम्।।

वसिष्ठ सिष्ट पिप्पल आदि कर्दम आदि शर्मदे।

त्वदीय पाद पङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥5॥

सनत्त्कुमार नाचिकेत कश्यप आदि षट्पदैः।

धृतं स्वकीय मानसेषु नारद आदि षट्पदैः।।

रवीन्दु रन्तिदेव देवराज कर्म शर्मदे।

त्वदीय पाद पङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥6॥

अलक्ष लक्ष लक्षपाप लक्ष सार स आयुधं।

ततस्तु जीव-जन्तु तन्तु भुक्ति-मुक्ति दायकम्।।

विरञ्चि विष्णु शंकरं स्वकीयधाम वर्मदे।

त्वदीय पाद पङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥7॥

अहोऽमृतं स्वनं श्रुतं महेश केश जातटे।

किरात सूत वाडवेषु पण्डिते शठे नटे।।

दुरन्त पाप ताप हारि सर्व जन्तु शर्मदे।

त्वदीय पाद पङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥8॥

इदं तु नर्मदाष्टकं त्रिकालमेव ये सदा।

पठन्ति ते निरन्तरं न यान्ति दुर्गतिं कदा।।

सुलभ्य देह दुर्लभं महेशधाम गौरवं।

पुनर्भवा नरा न वै त्रिलोकयन्ति रैरवम्॥9॥

त्वदीय पाद पङ्कजं नमामि देवि नर्मदे।

त्वदीय पाद पङ्कजं नमामि देवि नर्मदे॥

।। इति श्रीमद् शंकराचार्य स्वामी रचितं नर्मदा अष्टकम् सम्पूर्णं ।।

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